बातचीत ही विकल्प

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Edited By Amrit Vichar
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नए कृषि कानूनों को रद किए जाने की मांग पर किसान आंदोलनरत हैं। किसानों के भारत बंद का व्यापक असर देश में देखने को मिला। देश के 20 विपक्षी दल किसानों के समर्थन में हैं। आंदोलन समर्थकों का कहना है कि मोदी सरकार चंद उद्योगपतियों के मुनाफे की खातिर पूरे देश का भविष्य खतरे में …

नए कृषि कानूनों को रद किए जाने की मांग पर किसान आंदोलनरत हैं। किसानों के भारत बंद का व्यापक असर देश में देखने को मिला। देश के 20 विपक्षी दल किसानों के समर्थन में हैं। आंदोलन समर्थकों का कहना है कि मोदी सरकार चंद उद्योगपतियों के मुनाफे की खातिर पूरे देश का भविष्य खतरे में डालने की जिद पर अड़ी है। सरकार को अगर किसानों की समृद्धि की चिंता है तो उनकी मांगों को सुनना चाहिए। किसानों की सरकार के साथ बुधवार को बैठक तय थी। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को अचानक किसानों को मिलने का न्योता भेज दिया।

बैठक के लिए पहले पांच किसान नेताओं को बुलाया गया था, बाद में 13 शामिल हुए। कुछ किसानों ने यह कहते हुए विरोध किया कि एक दिन पहले बैठक क्यों और 40 की जगह 13 सदस्य ही क्यों शामिल किए गए? बैठक में कई विशेषज्ञ मौजूद रहे जिन्होंने किसानों को समझाने की कोशिश की कि किस बदलाव का आगे चलकर क्या असर होगा। फिर भी किसान नेता अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे थे, इसलिए बैठक बेनतीजा रही।

शायद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने मंगलवार के भारत बंद को लेकर किसान आंदोलन के ताप को टटोल लिया । तभी बुधवार को सरकार ने तीन नए कृषि कानूनों में बदलाव का लिखित प्रस्ताव किसानों को भेजा लेकिन, किसान कानून रद करने की मांग पर अड़े हैं। उन्होंने प्रस्ताव को ठुकरा भी दिया। सरकार की ओर से किसानों को जो लिखित प्रस्ताव भेजा गया उसमें मुख्य रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य का जिक्र किया गया है। इसके अलावा सरकार की ओर से प्रस्ताव में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, मंडी सिस्टम में किसानों को सहूलियत देने और प्राइवेट प्लेयर्स पर टैक्स लगाने की बात की गई है। अब सरकार ने किसानों को छठे दौर की बातचीत के लिए निमंत्रण दिया है।

भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा था कि सरकार जो ड्राफ्ट भेजेगी, उस पर चर्चा के बाद तय करेंगे कि आगे क्या करना है। हालांकि सरकार कानूनों में संशोधन करने के लिए तैयार हो गई, लेकिन किसान कानूनों को रद किए जाने की मांग से पीछे हटने तैयार नहीं हैं। अब बातचीत से बात बन जाय तो ठीक, नहीं तो सरकार कृषि क़ानून वापस ले ले फिर राज्यों पर छोड़ दें कि वे अपने राज्य के किसानों के लिए अपना कानून बनाएं या न बनाएं। पहले झारखंड- बिहार के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाएं जहां मंडी नहीं है या न के बराबर हैं। वैसे बातचीत ही सही विकल्प है। अब देखना होगा कि क्या सरकार किसानों की बात मानती है या फिर किसानों को किसी तरह मना लेती है।