सह-अस्तित्व: कुत्ते और इंसान 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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देशभर में कुत्तों पर चर्चा हो रही थी। कुछ लोग कुत्तों के विरोध में उतर आए थे और कुछ पक्ष में। मेरी कॉलोनी में भी पहले दो-तीन स्ट्रीट डॉग्स होते थे, जिनसे कोई परेशानी नहीं थी। अब 10-12 स्ट्रे डॉग्स हैं, जिनमें से एक दो खतरनाक हैं। शायद पहले किसी के पाले हुए कुत्ते रहे होंगे। ये बाइक और स्कूटी वालों के पीछे भागते हैं व कई लोगों ने बच्चों पर झपटने की शिकायत भी की है। सभी जगह यही हाल है। रात में तो ये बहुत खूंखार हो जाते हैं।

भूले-भटके कभी नगर पालिका या नगर निगम इन्हें स्टरलाइजेशन के लिए ले जाना चाहें तो मोहल्ले के लोग ही ले जाने नहीं देते। रिजल्ट यह कि इनकी संख्या में दिनों-दिन वृद्धि होती जा रही है। गलियों में झूठा खाना और मल-मूत्र पड़ा रहता है, जिसके साथ जीना नियति बन गई है। खैर गली का मामला है। बैर मोल नहीं लेना। आपसी समझदारी जरूरी है। जिंदगी चल रही है इसी के साथ। पालतू कुत्तों की बात करें तो ‘लव मी लव माय डॉग’ वाली पॉलिसी अधिकतर कुत्ता पालकों की होती है। इसी सिलसिले में एक पुरानी घटना याद आ रही है। 

स्मार्ट सिटी बनने जा रहे एक बड़े शहर की। एक परिचित दो-तीन बार घर आ चुके थे और बार-बार अपने घर आने का आग्रह करते थे। एक बार हम दोनों पति-पत्नी उनके घर चले गए तो महाशय के साथ तीन कुत्तों ने हमारा स्वागत किया। एक जर्मन शेफर्ड, एक लैबराडोर और तीसरे की नस्ल याद नहीं। कुछ याद रखने जैसा माहौल ही नहीं था। भाईसाहब बोले कि मेरे पीछे सीधे चलते हुए आना, उनकी तरफ मत देखना। मन तो था पर कहने की हिम्मत न हुई कि हम वापस जा रहे हैं। खैर, उनके आदेशों का त्वरित पालन किया। किसी तरह ड्राइंग रूम में पहुंचकर सोफे में बैठे। 

बातचीत का सिलसिला कुत्तों से ही शुरू हुआ। भाईसाहब ने बताया कि यह हमेशा खुले ही रहते हैं। उनके नाम ले लेकर उनकी क्वालिटी बताने लगे। सफेद रंग का लैब्राडोर बिल्कुल सीधा-साधा। दूसरा छोटे साइज का काफी खतरनाक। तीसरा जर्मन शेफर्ड तो कई बार घर आए लोगों को काट भी चुका है। उन्होंने बहुत हंसते-हंसते बताया कि एक काफी वृद्ध महिला की हथेली में जर्मन शेफर्ड ने अपना दांत आर-पार कर दिया। सुनकर हम दोनों तो बहुत भयभीत हो गए पर उस वक्त उन्हीं की दया पर निर्भर थे। 

जैसे बैठे थे वैसे ही बैठे रहना था। उन्होंने बताया कि अगर हमने सोफे के कपड़े को ठीक करने की कोशिश की या टेबल से कोई भी चीज उठाने या देखने की कोशिश की तो यह तुरंत काट लेगा। शोक ग्रस्त होकर कहिये या किसी राष्ट्रीय त्योहार के तहत राष्ट्रगान गाने जैसे हम अटेंशन में बैठे हुए थे। हाथ-पैर चिपके थे और होंठ भी खुलने का साहस नहीं कर रहे थे। चाय नाश्ता भी आया, लेकिन डरते-डरते चाय का कप उठाया और खत्म होने पर बहुत ही सावधानी के साथ टेबल पर रखा। नाश्ते को तो छूने का सवाल ही नहीं होता।

कुत्तों से मुझे नफरत नहीं है, पर बेतहाशा प्यार भी नहीं। सदियों से यहां सह-अस्तित्व जीवन परंपरा का हिस्सा रहे हैं। मगर यह भी जरूरी है कि एक दूसरे को नुकसान पहुंचाए दोनों का अस्तित्व और जीवन की मर्यादा बनी रहे। सह-अस्तित्व की इस धारणा में कई बार कुत्तों के सामने इंसान का कद बौना हो जाता है। ऐसे लोगों को देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि जो मेहमानों के आने पर भी कुत्तों को बांधना जरूरी नहीं समझते। वह मेहमानों को चुम्मा-चाटी करता रहे तो दांत खोलकर हंसते रहेंगे। जरूरी नहीं हर कोई यह पसंद करता हो।

इसी तरह सुबह-सवेरे कुत्तों को घुमाने वाले लोग भी जगह-जगह सड़क में गंदगी करवाते हैं। भारी भरकम कुत्ते को वह नहीं घूमाते,बल्कि कुत्ता उन्हें घुमाता है। पूरा दम लगाकर भी वे उसे कंट्रोल नहीं कर पाते। कई तो ऐसे भी हैं, जो उन्हें खुला छोड़ देते हैं। कोई डरे, किसी को काटे उनकी बला से। न बाहर के देशों की तरह यहां पर सजा का प्रावधान, न अगला इतना समझदार कि इलाज का पूरा प्रबंध कराए। बचकर निकलने में ही फायदा है। अगर बच सके तो...अमृता पांडे