संस्मरण : कैनवास की मोनालिसा

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Edited By Anjali Singh
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यूं तो गाहे-बगाहे अपने अगल-बगल मैंने रेल से कई यात्राएं की है, लेकिन उन यात्राओं की दूरी ज्यादा से ज्यादा बीस से तीस किलोमीटर तक ही रही है। कभी कोई लंबी रेलयात्रा नहीं की। इसलिए इन छोटी रेल यात्राओं को मैं अपनी मुकम्मल रेलयात्रा नहीं कह सकता। हां! सन 2018 की गंभीर बीमारी की परिस्थितियों ने मुझे पहली बार एक मुकम्मल और पूर्ण रेलयात्रा कराई। इस रेलयात्रा को ही मैं अपनी सार्वकालिक व पूर्ण रेलयात्रा मानता हूं। मुंबई से लौटते समय ज्योहीं रेल ने पटरियों पे चलना और दौड़ना शुरू किया तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मुझे दुनिया जहान की सारी खुशियां मिल गईं हों। ऐसा नहीं की मुंबई जैसे महानगर और अर्थ की राजधानी में हमारे वृहद उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का जौनपुर जैसा जिला अनुपस्थित हो।

यह सच है कि मेरे बीमार होने की दशा में इलाज के मामले में मुंबई जौनपुर से कहीं ज्यादा बेहतर और सर्वोत्कृष्ट रहा, लेकिन हम संवेदनशील कलम वाले न जाने क्यों जीवन की मशीनी आपाधापी और इतने बड़े-बड़े कंक्रीट के जंगल से अपनी संवेदना बैठा नहीं पाते। वैसे भी मुंबई प्रवास के समय लगा कि इस महानगर में हमारे जनपद जौनपुर के हर घर से कोई न कोई अपने घर की रोटियां अपने प्रयास से चला पा रहे हैं। इतना ही नहीं, यहां पर हमारे जौनपुर के चंद लोग तो आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक कड़ी के वे मील के पत्थर है, जिसे मुंबई नकार नहीं सकती।

मेरी दवा व इलाज करवाने के बाद की वापसी केवल एक मरीज की वापसी नहीं थी, बल्कि मेरे अंदर के एक साहित्यकार की भी वापसी थी। जिसे मैंने अपने रेल के डिब्बे में बखूबी महसूस किया, जो रेल का डिब्बा जाते वक्त नीरस व बेजान सा लगा था, वही रेल का डिब्बा घर वापसी के समय महज एक रेल का डिब्बा भर नहीं अपितु वह रेल का डिब्बा हमारे यहां का पूरा गांव सा लग रहा था। रेल के डिब्बे का गांव अपने में सब कुछ समेटे था। इसमें गांव की सरलता के साथ ही वह सोंधापन पन था, जिसके चलते हमारे जौनपुर का हर गांव जाना जाता है। इस रेल के डिब्बे से बातकर कुछ लोगों का खिलखिलाना जीवन की आयुर्वेदिक ऊर्जा का आभास करा रहा था। बीच में ग्रामीण तंज के अंदाज में कुछ राजनैतिक चर्चा-परिचर्चा इस यात्रा को और यादगार बना रहे थे। मैं खुद इस रेलयात्रा को किसी लेखक के यात्रा-वृत्तांत को जी रहा था।


हां इस रेलयात्रा में मेरे अंदर के लेखक को एक बात कचोट जरूर रही थी कि इस रेलयात्रा के कचोटपन की पात्र उस डिब्बे की खुली खिड़की के पास बैठी बिल्कुल शांत सी अपने अपने में खोई हुई सी लड़की, जिसके अंदर इस यात्रा का कहीं दूर-दूर तक कोई उल्लास नहीं दिख रहा था। वह जैसे अपनी किसी असहाय पीड़ा के आकंठ में डुबी बस बाहर देख रही थी। मुझे लगा कि शायद इसने रेलयात्रा नहीं कि, बल्कि इस पूरी रेलयात्रा में वह केवल अपने प्रश्नों का आत्ममंथन कर रही थी या उनके उत्तर को तलाश रही थी।

मेरे इस प्रथम पूर्ण रेलयात्रा में वह नीली सलवार पहनी हुई लड़की चुभ रही थी और मुझे लगा कि यह अपने प्रेम के विश्वास की कस्तुरी किसी धोखेबाज को दे बैठी है। सच मैं कवि तो था, लेखक भी था, लेकिन किसी कैनवास का चित्रकार न था, लेकिन फिर भी ये लड़की मेरे रेलयात्रा के कैनवास की एक मोनालिसा बनके रह गई है।रंगनाथ द्विवेदी, लेखक