अमर स्मृतियां : स्कूल के दिन याद आते ही झूम उठता है मन

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार डेस्क: स्कूल के दिन यह शीर्षक ही ऐसा है जिसे सुनते या पढ़ते ही मन रोमांच  से भर उठता है। यह वो सुनहरे दिन थे जो जीवन की सबसे अमर स्मृतियों में गिने जाएंगे। केजी से लेकर 12वीं तक की कक्षाओं का समय मेरे जीवन का वह समय था जिसको याद करके मन खुशियों से भर जाता है और उन पलों को जीने की चाहत फिर से जाग उठती है।

स्कूल की घंटी बजने से लेकर छुट्टी की घंटी बजने तक का समय कैसे बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। उस समय मोबाइल का दौर नहीं था इसलिए दोस्तों से बात करने के लिए पूरे 1 दिन का इंतजार करना पड़ता था। लंच टाइम में टिफिन शेयर करना, तरह-तरह के खेल खेलना उसमें जीतने की खुशी और हारने पर मिलकर हौसला बढ़ाना ,परीक्षा के दिनों का तनाव, उसके बाद छुट्टियों का उल्लास अभी भी याद आता है। उन दिनों ना तो जिम्मेदारियां का बोझ था बस परीक्षा में अच्छे अंकों से पास होने के अलावा और कोई चिंता न थी।

विद्यालय का जीवन ही हमारी वास्तविक नींव है। स्कूल केवल शिक्षा प्राप्त करने का स्थान ही नहीं है बल्कि जीवन के विविध पहलुओं को दिशा देने वाला मंदिर भी है। विद्यार्थी जीवन बीते हुए बहुत समय हो गया हो, लेकिन आज के तकनीकी युग में सोशल मीडिया के द्वारा पुराने सब दोस्त फिर से मिल सके और पुरानी यादें ताजा हो पाई हैं। विद्यार्थी जीवन ,जीवन का वह सोपान है जहां ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन ,मित्रता और संस्कारों की नींव रखी जाती है लेकिन साथ-साथ जो शरारतें और  हंसी - मजाक कक्षा के बीच और बाद में होता था वह सबसे मनोरंजक पल होता था। शिक्षकों का नामकरण करना और किसी खास  हावभाव को चिन्हित करना बड़ा आनंद देता था। आज टीचर किस रंग की साड़ी पहन कर आएंगी इसकी शर्त लगाने का भी अपना अलग मजा था।

कक्षा में टीचर द्वारा खास मुझे चैप्टर रीडिंग करवाना या फिर कॉपियां स्टाफ रूम में रखने के लिए कहना, टीचर के अनुपस्थित होने पर खास मुझे क्लास को देखने की जिम्मेदारी देना यह सब छोटी-छोटी बातें गर्व और हर्ष का विषय बनती थी और स्पेशल फील कराती  थी।आज भी कुछ टीचर्स संपर्क में है और पुरानी यादें साझा करती हैं तो बहुत अच्छा लगता है।

स्कूल के दिनों में कोई ब्यूटी क्वीन, कोई गॉसिप गर्ल ,कोई टॉमबॉय कोई  मिस कैटवॉक,कोई चुगली आंटी के नाम से  चुपके से अलंकृत की जाती थी जो अपने आप में  मनोरंजन का कारण होता था। ऐसी न जाने कितनी अनगिनत स्मृतियां हैं जिन्हें शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता। स्कूल के दिन हमारी स्मृतियों के वे अध्याय हैं जहां अनुशासन के साथ-साथ मित्रता का संसार बसता था। अध्यापकों के अनुशासन, स्वयं के परिश्रम एवं मित्रों के प्रेम ने जीवन को रंगीन बना दिया था। आज जब हम जीवन की जटिलताओं से थक जाते हैं तब अनायास ही हमारी स्मृतियां हमे स्कूल के दिनों की ओर सहज ही ले जातीं हैं।
लेखिका- डॉ. मनीषा चतुर्वेदी