संपादकीय : आशंकाओं की आहट 

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Edited By Amrit Vichar
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सर्दी के महीनों में अमूमन भीषण ठंड के कुछ दिनों के दौर आते हैं। कई बार यह चालीस दिन लंबा होता है, जिसे चिल्ला जाड़ा कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के एनवायरमेंटल पैनल ऑफ क्लाइमेट की ताजा रिपोर्ट ने जो बताया है उससे लगता है कि आगामी कुछ दशकों में शीत लहर और चिल्ला जाड़े वाली बातें किताबी हो जाएंगी। रिपोर्ट कहती है कि 1980 से 2020 के बीच यानी पिछले चालीस वर्षों में अत्यंत ठंडी रातों और बहुत सर्द दिनों की संख्या में चार गुना कमी आई, जबकि अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या लगातार बढ़ी है।

वर्ष 2100 तक सर्दी का लगभग लोप हो जाएगा। यह बदलाव महज मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि धरती की जलवायु प्रणाली में गहराई से हो रहे असंतुलन का संकेत है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव देश के पर्यावरण, समाज, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सब पर पड़ने वाला है। ज्यादा गर्म दिनों का मतलब ऊर्जा की मांग में जबरदस्त बढोतरी, जिससे उत्पादन लागत और बिजली संकट दोनों बढ़ेगा। स्वास्थ्य के क्षेत्र में लू और हीटवेव से होने वाली मौतें बढ़ेंगी। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगले दो दशकों में भारत में गर्मी से संबंधित बीमारियों और मौतों की दर दोगुनी हो सकती है। बाढ़ की बारंबारता भी बढ़ेगी। पर्वतीय क्षेत्रों पर इसका असर दिखने लगा है। बर्फ की परतें पिघल रही हैं, ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और नदियों का प्राकृतिक जल प्रवाह असंतुलित होने से अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं तेज हो गई हैं। यहां ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों इससे प्रभावित है। जिन फसलों, फलों और फूलों की खेती ठंडे मौसम पर निर्भर थी, उनकी उपज में गिरावट दर्ज हो रही है। पारंपरिक बागवानी बेल्ट ऊंचाई की ओर खिसकने से छोटे किसानों की आजीविका पर संकट है। तापमान बढ़ने से कीटों और बीमारियों का प्रकोप भी तेज हुआ, जो फसलों के साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके चलते असंतुलित होते जल चक्र ने मानसून के पैटर्न में बदलाव ला दिया है, जिससे सूखा और अतिवृष्टि आम होती जा रही है। 

नदियों का प्रवाह घटने और जलस्रोतों के सूखने से पेयजल संकट और बढ़ेगा तो लू, जंगल की आग, चक्रवात और भूस्खलन की तीव्रता और आवृत्ति की आशंका बलवती होगी। देश के जन-धन को अरबों रुपये का नुकसान पहुंचेगा। राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण प्राधिकरण की पहलें और मिशन लद्दाख हिमालय जैसी सरकारी योजनाएं चल तो रही हैं, पर जिस तेजी से आपदा बढ़ रही है इनकी रफ्तार और दायरा अभी भी पर्याप्त नहीं। सरकारों को समय रहते दीर्घकालिक और बहुस्तरीय तैयारी करनी होगी। पर्वतीय राज्यों में जलवायु अनुकूल कृषि, जल संरक्षण, ग्लेशियर निगरानी प्रणालियां विकसित करना तो शहरी इलाकों में हरित आवरण, वर्षा जल संचयन और ऊर्जा दक्ष भवनों को बढ़ावा देना होगा। आपदा प्रबंधन प्रणाली को स्थानीय स्तर तक सशक्त करना और स्वास्थ्य तंत्र को ग्रीष्म ऋ तु संबंधी रोगों से निपटने के लिए तैयार करना अत्यावश्यक है। सच तो यह है कि संकट विकट निकट है, ऐसे में जब तक पर्यावरणीय चेतना शासन की प्राथमिकता में शामिल नहीं होगी, इस पर्यावरणीय खतरे का मुकाबला मुश्किल होगा।