मंत्रों के जाप का महत्व
मंत्र जाप कितने तरीकों से किया जा सकता है ? शास्त्रों के अनुसार मंत्र जाप करने का सही तरीका क्या है ? बेहद कम लोग जानते हैं कि मंत्र जाप के भी प्रकार हैं यानी मंत्र जाप के कई तरीके हैं और हर तरीके के लिए अलग-अलग नियम। अगर मंत्र जाप ठीक से न किया जाए, तो वह फलित नहीं होता और न ही उसकी ऊर्जा आपको किसी प्रकार का लाभ पहुंचाती है। आइए समझते हैं कि मंत्र जाप कितने प्रकार के होते हैं और सही तरीके से मंत्र का जाप कैसे करना चाहिए।
मंत्र जाप के नियम
जाप तो कई लोग करते हैं, लेकिन ठीक तरीके से जाप करने के शास्त्रीय नियम क्या हैं, इसके बारे में बेहद कम लोगों को जानकारी है। मंत्र जाप के लिए शरीर की शुद्धि आवश्यक है। इसलिए स्नान करके ही मंत्र जाप करना चाहिए। मंत्र जाप हमेशा घर में एकांत व शांत स्थान में करना चाहिए। पहले लोग प्राकृतिक परिवेश जैसे कि पेड़ के नीचे, नदी के किनारे, वन में, साधना स्थल इत्यादि जगहों पर करते थे। इससे न केवल एकाग्रता में मदद मिलती है, बल्कि प्रकृति से भी ऊर्जा मिलती है। जाप के लिए कुश के आसन पर बैठना चाहिए, क्योंकि कुश उष्मा का सुचालक होता है।
इससे मंत्रोच्चार से उत्पन्न ऊर्जा हमारे शरीर में समाहित होती है। जाप में रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रखें, ताकि सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का प्रवाह आसानी से हो सके, क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी से पूरे शरीर में ऊर्जा प्रभावित होती है। जाप में मंत्रोच्चारण की गति समान रहनी चाहिए यानी न बेहद तेज और न धीमी। अगर संभव हो, तो मानसिक जाप यानी मन में ही मंत्र का जाप करें और मंत्र का शुद्ध उच्चारण करें। गलत उच्चारण से आपको नुकसान हो सकता है या मंत्र का प्रभाव नगण्य हो सकता है। अगर आप साधारण जप कर रहें हैं, तो तुलसी की माला का प्रयोग करें, लेकिन कामना सिद्ध करने वाले मंत्र जाप में चंदन या रूद्राक्ष की माला प्रयोग करें।
मंत्र जाप के प्रकार
नाम जाप से भक्त के भारी से भारी संकट भी मिट जाते हैं।
मोक्ष प्राप्ति के लिए अंगूठे के साथ तर्जनी को मिलाकर जाप करना चाहिए।
हिन्दू धर्म में कई ऐसे मंत्र हैं, जिनका जाप करना बेहद लाभदायक होता है। इसलिए कई लोग समय निकालकर मंत्र जाप करते हैं और मंत्र से जुड़ी ऊर्जा का लाभ लेना चाहते हैं। शास्त्रों के अनुसार मंत्र तीन प्रकार के होते हैं- वैदिक मंत्र, तांत्रिक मंत्र और शाबर मंत्र। मंत्र जाप भी तीन प्रकार से किया जाता है।
वाचिक जप-जब बोलकर मंत्र का जाप किया जाता है, तो वह वाचिक जाप की श्रेणी में आता है।
उपांशु जप- जब जुबान और ओष्ठ से इस प्रकार मंत्र उच्चारित किया जाए, जिसमें केवल ओष्ठ कंपित होते हुए प्रतीत हों और मंत्र का उच्चारण केवल स्वयं को ही सुनाई दे, तो ऐसा जाप उपांशु जप की श्रेणी में आता है।
मानसिक जाप- यह जाप केवल अंतर्मन से यानी मन ही मन किया जाता है। कई लोग ध्यान और साधना के दौरान मंत्र जाप करते हैं। रामचरित मानस में लिखा है कि ‘जापहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहि सुखारी।।’ अर्थात नाम जाप से भक्त के भारी से भारी संकट भी मिट जाते हैं।
मंत्र जाप का समय
मंत्र का जाप ब्रह्म मुहूर्त में करना सबसे अच्छा माना जाता है, लेकिन अगर समय नहीं है, तो किसी भी समय कर सकते हैं। मंत्र का जप प्रातः काल पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए एवं शाम में पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप करना श्रेष्ठ माना गया है। मंत्र का प्रभाव महसूस करने के लिए कम से कम एक माला तक मंत्र जाप अवश्य करना चाहिए। अक्षत, अंगुलियों के पर्व, पुष्प आदि से मंत्र जाप की संख्या नहीं गिननी चाहिए। मोक्ष-प्राप्ति के लिए अंगूठे के साथ तर्जनी को मिलाकर जाप करना चाहिए। मानसिक शांति व संतोष के लिए अंगूठे के साथ मध्यमा और सिद्धि के लिए अंगूठे व अनामिका से जाप किया जाना चाहिए। सर्वसिद्धि के लिए कनिष्ठा उंगली और अंगूठे को मिलाकर जाप करना सर्वोत्तम है।
