बोध कथा
ललित नगरी के राजा अनंतदेव एक बार अपने महल में भोजन कर रहे थे। अचानक खाना परोस रहे सेवक के हाथ से थोड़ी सी सब्जी राजा अनंतदेव के कपड़ों पर छलक गई। राजा अनंतदेव की त्यौरियां चढ़ गईं। जब सेवक ने यह देखा तो वह थोड़ा घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी राजा अनंतदेव के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा अनंतदेव के क्रोध की सीमा न रही।
अनंतदेव ने सेवक से पूछा, तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया? सेवक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, महाराज! पहले आपका गुस्सा देखकर मैंने समझ लिया था कि अब मेरी जान नहीं बचेगी, लेकिन फिर सोचा कि लोग कहेंगे की राजा अनंतदेव ने छोटी सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दे दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती। तब मैंने सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे और मुझे ही अपराधी समझे।
राजा अनंतदेव को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए कि एक सेवक अगर राजा को क्षमा कर सकता है, तो मैं राजा होकर क्या एक सेवक को क्षमा नहीं कर सकता। क्षमा करने वाला, गलती करने वाले से सदैव बड़ा होता है। ऐसा सोचकर राजा शर्मिंदा हुआ और सेवक को क्षमा कर दिया।-सुरेन्द्र अग्निहोत्री
