संपादकीय: ग्लोबल साउथ के सारथी

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Edited By Amrit Vichar
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आसियान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की एक्ट ईस्ट नीति में आसियान की केंद्रीय भूमिका बताना सर्वथा उचित है। यह हमारी विदेश नीति के उस दीर्घकालिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसे दक्षिण-पूर्व एशिया को रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में रख कर तैयार किया गया है। “आसियान सेन्ट्रैलिटी” के जरिए भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए बनी सभी रणनीतिक, आर्थिक योजनाओं में आसियान देशों की महत्वपूर्ण भूमिका स्वीकारता और उसका समर्थन करता है। 

भारत सदैव “आसियान सेन्ट्रैलिटी” का समर्थन करता आया है, इसके कई ठोस प्रमाण हैं। 2026 को “समुद्री सहयोग वर्ष” घोषित करना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सामुद्रिक सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में साझा कार्य योजना तैयार करने का एक ठोस कदम है। आसियान के साथ समुद्री सुरक्षा मजबूत बनाने को नौसेना अभ्यासों, तटीय निगरानी प्रणाली और समुद्री डोमेन अवेयरनेस पर हम काम कर रहे हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामक गतिविधियों, कृत्रिम द्वीप निर्माण और नौसैनिक विस्तार को देखते हुए यह पहल भारत की सुरक्षा और विकास के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय स्वरूप प्रदान करती है। 

अमेरिका की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत इस घोषणा के माध्यम से संतुलनकारी भूमिका निभा रहा है। इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों के साथ समुद्री, ऊर्जा, जलवायु और पर्यटन क्षेत्रों में भारत की साझेदारी बढ़ने से भारत को सामरिक गहराई, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों तक सीधी पहुंच मिलेगी तो वहीं, आसियान देशों को भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार, तकनीकी दक्षता और निवेश का लाभ। “बौद्ध सर्किट”, “रामायण कनेक्ट” और क्रूज टूरिज्म जैसी परियोजनाएं साझा सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन के आर्थिक लाभ से जोड़ेंगी। शिक्षा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, साइबर सुरक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में साझा अनुसंधान परियोजनाएं भारत और आसियान दोनों की तकनीकी आत्मनिर्भरता को गति दे रही हैं। 

“इंडिया-आसियान कल्चरल एक्सचेंज”, “यूथ फेलोशिप” और “स्कॉलरशिप प्रोग्राम्स” जैसी पहलें इस साझे इतिहास को आधुनिक सहयोग में बदलने के नए प्रयास हैं। भारत और आसियान की साझेदारी न केवल क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के लिए आवश्यक है, बल्कि यह “ग्लोबल साउथ” की नई आवाज भी है। मोदी का कहना कि “भारत और आसियान, ग्लोबल साउथ के सारथी हैं” इस बात का प्रतीक है कि दोनों विकासशील विश्व के हितों, संतुलित वैश्वीकरण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थक हैं। भारत-आसियान मिलकर 68 लाख करोड़ लोगों या दुनिया की लगभग चौथाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, वैश्विक आपूर्ति शृंखला के केंद्र आसियान की 299 लाख करोड़ की जीडीपी मायने रखती है। ऐसे में आज भारत व आसियान के बीच शिक्षा, पर्यटन, विज्ञान, खेल, ग्रीन एनर्जी और साइबर सुरक्षा में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। यही साझेदारी हिंद-प्रशांत में भारत को रणनीतिक स्थिरता का स्तंभ और दक्षिण-पूर्व एशिया को भारत का सशक्त साझेदार बनाएगी, जिससे सहयोग, परस्पर सम्मान और साझा समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त होगा।