Bareilly: साहित्य के रंगों में डूबा शहर...सबदफेरी के साथ किताब उत्सव शुरू
बरेली, अमृत विचार। शब्दों, सुरों और विचारों के संगम ने बुधवार को बरेली को एक नई सांस्कृतिक चेतना से भर दिया। विंडरमेयर थिएटर में राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से आयोजित पांच दिवसीय ‘ किताब उत्सव’ का शुभारंभ साहित्यिक गरिमा और रचनात्मक ऊर्जाओं के बीच हुआ। सुबह शहर की गलियों में निकली कवितामयी यात्रा ''सबदफेरी'' ने उद्घाटन का ऐसा रंग भरा कि कंपनी बाग से सिविल लाइंस तक बरेली साहित्य की सुगंध से महक उठा।
सुबह 7 बजे शुरू हुई यह सबदफेरी रामपुर गार्डन और सिविल लाइंस की सड़कों से होती हुई विंडरमेयर थिएटर पहुंची। जिसके बाद दोपहर 2 बजे पुस्तक प्रदर्शनी के औपचारिक उद्घाटन के साथ कार्यक्रमों की शृंखला आरंभ हुई। उद्घाटन सत्र में देशभर के प्रख्यात साहित्यकारों में शिवमूर्ति, सुधीर विद्यार्थी, खालिद जावेद, अखिलेश, वीरेंद्र यादव, उदयन वाजपेयी, योगेंद्र आहूजा, संजीव कुमार, प्रभात सिंह समेत अनेक विद्वानों की उपस्थिति रही।
स्टाल पर मनपसंद लेखकों की किताबों की दिखी तलाश
किताबों के प्रति रुझान के सवाल पर सभी इसे लेकर एकमत हैं कि आज भी पुराने लेखकों की साख बनी हुई है। पुस्तक प्रदर्शनी में पुरानी किताबों में पाठकों की अब भी काफी रुचि देखने को मिली। फणीश्वर रेणू, प्रेमचंद, धर्मवीर भारती, रामधारी सिंह दिनकर समेत अन्य लेखकों की किताबों को पाठक स्टालों पर खोजते दिखाई दिए। जिस स्टाल पर उनके मनपसंद लेखक की किताब मिली, वहां से वे उसे खरीदकर ले गए। श्री लाल शुक्ल की राग दरबारी लोग न केवल खुद खरीद रहे हैं, बल्कि साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते दिखाई दिए। धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता और रेणू का मैला आंचल हाथों-हाथ बिक रही है। वहीं, प्रेमचंद की गोदान, कर्मभूमि व रंगभूमि को लेकर भी न सिर्फ युवा बल्कि बुजुर्गों में भी उत्साह देखने को मिला। दिनकर की रश्मिरथी की मांग भी खूब रही। वहीं, विनोद कुमार शुक्ल की नौकर की कमीज, चित्रलेखा और रेत की मछली जैसी कालजयी रचनाओं को भी हर उम्र के पाठकों ने खोजा।
देशप्रेम और बलिदान की गाथाओं पर चर्चा
पहले सत्र में ''देशप्रेम और बलिदानी गाथाओं की खोज'' विषय पर रमाशंकर सिंह ने सुप्रसिद्ध लेखक सुधीर विद्यार्थी से बातचीत की। उन्होंने कहा, ''क्रांतिकारी लेखन वही कर सकता है जो दर्द जानता हो।'' विद्यार्थी ने बताया कि उनका लेखन किसी एक विधा में नहीं बंधता, उसमें संस्मरण, रेखाचित्र और दृश्यचित्र सभी सम्मिलित हैं। उन्होंने कहा कि लेखन उनके लिए एक कठिन साधना है, जिसमें शीर्षक तय करने से लेकर शैली चुनने तक महीनों लग जाते हैं।
हिंदी उपन्यास का स्त्री-वर्ष : ‘सह-सा’ पर विमर्श
दूसरे सत्र में राजकमल प्रकाशन की ओर से मनाए जा रहे ‘ हिंदी उपन्यास के स्त्री-वर्ष’ पर गोष्ठी हुई। गीतांजलि श्री के नवीनतम उपन्यास ‘सह-सा’ पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में प्रत्यक्षा, संजीव कुमार, वीरेंद्र यादव और वंदना राग ने उपन्यास पर अपने विचार रखे। लेखिका प्रत्यक्षा ने कहा है कि ''''सह-सा’ जीवन, मृत्यु और रिक्तता से जूझने की कहानी है, जहां मृत्यु के बाद भी पात्र स्मृतियों में जीवित रहते हैं। संजीव कुमार ने उपन्यास की भाषा पर कहा है कि, “गीतांजलि श्री ने इसमें मनुष्येतर दुनिया में प्रवेश पा लिया है, भाषा खिलंदड़ और कौतुकपूर्ण है। वीरेंद्र यादव ने ‘माई’ और ‘रेत समाधि’ की तुलना करते हुए कहा कि यह उपन्यास उनकी कथा-यात्रा को आगे नहीं ले जाता, बल्कि परिवार की संरचना के इर्द-गिर्द ही घूमता है। सत्र के अंत में प्रत्यक्षा और वंदना राग ने अपने शीघ्र प्रकाश्य उपन्यासों ‘शीशा-घर’ और ‘सरक-फंदा’ से अंशपाठ किया।
बदलते समाज की बदलती कहानी
तीसरे सत्र में ''बदलते समाज की बदलती कहानी'' पर विमर्श हुआ। चर्चा का संचालन संदीप तिवारी ने किया और वक्ताओं में योगेंद्र आहूजा, अखिलेश, संजीव कुमार, मनोज कुमार पांडेय और आयशा आरफीन शामिल रहे। संजीव कुमार ने कहा कि कहानी में जो बदलाव आया है, वह ढांचागत बदलाव है। अब कहानी का आनंद उसके अंत में नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया में है। योगेंद्र आहूजा ने सोशल मीडिया के प्रभाव पर कहा कि उसने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन सतही भी किया है ''नए युग का मनुष्य संवाद नहीं करता, बस टिप्पणी करता है।'' लेखक अखिलेश ने कहा, ''इक्कीसवीं सदी स्वप्नभंग की सदी रही। बीते समय की कहानियां सपनों पर आधारित थीं, लेकिन अब हमारे सपनों का कत्लेआम हो चुका है। आयशा ने कहा कि ''समानता की बातें अब पर्याप्त नहीं हैं; महिलाओं की प्रधानता की बात करनी होगी, तभी वास्तविक समानता आएगी।
खालिद जावेद के ‘अरसलान और बहजाद’ का लोकार्पण
चौथे सत्र में प्रसिद्ध लेखक खालिद जावेद के नवीनतम उपन्यास ''अरसलान और बहजाद'' के हिन्दी संस्करण का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में उदयन वाजपेयी, रिजवान-उल-हक, खुर्शीद अकरम और इकबाल हुसैन मौजूद रहे। रिजवान-उल-हक ने कहा, ''अरसलान और बहजाद'' दो विपरीत स्वभावों वाले चरित्रों का उपन्यास है, अर्सलान परिस्थितियों से बुरा बनता है, जबकि बहजाद आरंभ से ही अंधकारमय है। उदयन वाजपेयी ने कहा कि ''खालिद जावेद ने इस उपन्यास में लेखन का स्वातंत्र्य पा लिया है। उन्होंने उपन्यास को कविता की शर्तों पर लिखा है।
साहित्य से रंगमंच तक ‘निर्वासन’ की प्रस्तुति
पहले दिन के आखिरी सत्र में लेखक अखिलेश के चर्चित उपन्यास ‘निर्वासन’ से रंगकर्मी अजय चौहान ने भावपूर्ण पाठ-प्रस्तुति दी। दर्शकों ने इस नाट्य-पाठ को लंबे समय तक तालियों से सराहा।
बरेली में नई साहित्यिक चेतना
किताब उत्सव के पहले दिन ही बरेली साहित्यिक विमर्श का केंद्र बन गया। एक ओर जहां नई कहानियों, उपन्यासों और विचारों की बहसें चलीं, वहीं दूसरी ओर पाठ और संवाद ने दर्शकों को बांधे रखा। शहर में अगले चार दिनों तक कविता, उपन्यास, आलोचना, संगीत और नाट्यकला के विविध सत्रों के आयोजन प्रस्तावित हैं। आयोजकों ने बताया कि उत्सव का उद्देश्य पुस्तकों को पाठकों के और करीब लाना है। यह सिर्फ एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भाषा, विचार और संवेदना का उत्सव है, जहां पाठक और लेखक आमने-सामने संवाद कर सकें।
