किताब उत्सव : किताब, संवाद और विचारों की संस्कृति को दी नई ऊर्जा

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। राजकमल प्रकाशन की ओर से विंडरमेयर थियेटर में आयोजित पांच दिवसीय किताब उत्सव का रविवार को समापन हो गया। आयोजन ने साहित्य प्रेमियों, छात्रों, लेखकों और पाठकों को एक ही मंच पर जोड़ते हुए किताब, संवाद और विचारों की संस्कृति को नई ऊर्जा दी। शहर के हजारों पुस्तक प्रेमियों ने पांच दिनों में आयोजित विविध सत्रों में भाग लेकर बरेली को एक जीवंत साहित्यिक नगर के रूप में प्रतिष्ठित किया।

अंतिम दिन की शुरुआत ''किताबें हमें बनाती हैं'' विषय पर सत्र से हुई, जिसमें वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग, लेखक व चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी और संपादक रवि सिंह ने भाग लिया। अशोक महेश्वरी ने कहा कि किताबें इंसान को करुणा, संवेदना और मानवता का बोध कराती हैं। प्रो. अग्रवाल ने कहा कि हम जैसी किताबें पढ़ते हैं, वैसा ही सोचने लगते हैं, इसलिए पढ़ने की दिशा का चयन सबसे ज़रूरी है। उन्होंने गोरा और ऐलिस इन वंडरलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि पढ़ना हमें अपने समय और समाज को नए ढंग से देखने की दृष्टि देता है।

मृदुला गर्ग ने बताया कि रेचल कार्सन की साइलेंट स्प्रिंग ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और पर्यावरण-जीवन के पारस्परिक संबंधों को समझाया। उन्होंने साझा किया कि बचपन में अनजाने में पढ़ी एक किताब बाद में कामू की द आउटसाइडर निकली। उन्होंने कहा कि अगर कोई किताब अपनी गिरफ्त में ले लेती है, तो लेखक की छवि से परे उसका संसार आपको अपने में समेट लेता है। रवि सिंह ने जोड़ा कि किताबें हमें अपने परिवेश से बाहर निकाल कर आत्मसंवाद करना सिखाती हैं।

दूसरे सत्र बात किताब में सोशल मीडिया पर साहित्य की भूमिका और बदलती भाषा पर चर्चा हुई। बुक ब्लॉगर्स सफ़ीना और विनय मिश्र ने कहा कि आज जब लोग वीडियो देखकर ज्ञान हासिल करना पसंद करते हैं, तब साहित्य को नई तकनीक के साथ जोड़ना आवश्यक है। विनय ने कहा, अगर अच्छी आवाजें सोशल मीडिया पर नहीं होंगी, तो बुरी आवाजें ज्यादा जगह ले लेंगी।

तीसरे सत्र अपनी धुन में रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा पर लेखक प्रभात सिंह और संपादक रवि सिंह ने चर्चा की। प्रभात सिंह ने कहा कि अनुवाद करते समय उन्हें लगा जैसे वे बॉन्ड की कहानियों के उन्हीं किरदारों और जगहों को फिर से जी रहे हों। उन्होंने बताया कि बॉन्ड के पिता का जन्म शाहजहांपुर में हुआ था। अगले सत्र बज़्म-ए-सुख़न में शायर शारिक कैफी, आशु मिश्रा और अहमद अजीम ने अपनी ग़ज़लों से माहौल को खुशनुमा बना दिया। शारिक कैफी की गजल कहीं न था वो दरिया जिसका साहिल था मैं…और अहमद अजीम की पंक्ति सच पूछिए तो किसको ख्याल अपने सर का है पर श्रोताओं की तालियां देर तक गूंजती रहीं।

अंतिम सत्र जिनसे शहर बरेली में बरेली के उन रचनात्मक व्यक्तित्वों को याद किया गया जिन्होंने शहर की सांस्कृतिक पहचान गढ़ी। डॉ. अवनीश यादव ने बाल साहित्यकार निरंकार देवसेवक, श्रवण कुमार ने आरजी वर्मा, सुनील मानव ने राधेश्याम कथावाचक, शावेज हाशमी ने अपने पिता हसीन हाशमी और रवि अग्रवाल ने आयुर्वेदाचार्य लाला गट्टूमल के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम के अंत में राजकमल प्रकाशन समूह ने बरेली के पाठकों, विद्यार्थियों और संस्कृति-प्रेमी जनता का आभार व्यक्त किया। इस उत्सव ने न केवल किताबों के प्रति प्रेम को पुनर्जीवित किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि साहित्य केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, जीने का तरीका भी है।

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