संपादकीय: सजा से सीख
बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल द्वारा वहां की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता विरुद्ध अपराधों में फांसी की सजा सुनाया जाना तकरीबन तय था। पहली वजह यह कि सत्तासीन रहते हुए उन्होंने अपने खिलाफ उठने वाली विपक्षियों की आवाज दबाने के लिए जो अमानवीय और आपराधिक अत्याचार किए थे, उसके खुले सबूत मौजूद थे।
दूसरे, सत्ता परिवर्तन के बाद उनके विरुद्ध सियासी बदले तथा जनविरोधी रुझानों में अतिशय विस्तार ने भी संकेत दे दिए थे कि सत्ताच्युत हसीना के लिए परिस्थितियां अत्यंत प्रतिकूल हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रिब्यूनल की निष्पक्षता, न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिशोध के तत्वों को लेकर गंभीर सवाल उठने और शेख हसीना द्वारा इस फैसले को ‘राजनीतिक साजिश’ बताए जाने, उनकी प्रतिक्रिया और इन दावों में दम होने के बावजूद कि जिस तरह मुकदमा चला, गवाही की गुणवत्ता और ट्रिब्यूनल के गठन में न्यायाधीशों के चयन पर प्रश्न चिह्न हैं, बांग्लादेश का जनमत फैसले के साथ दिखता है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रतिशोधात्मक राजनीति नई बात नहीं है और हसीना का मामला उसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। फिलहाल हसीना के पास अत्यंत सीमित विकल्प हैं। वे बड़ी अदालत में अपील के लिए बांग्लादेश नहीं जा सकतीं और वहां की राजनीतिक परिस्थितियां और उनके विरुद्ध गंभीर अभियोगों, उसके साक्ष्यों को देखते हुए न्यायिक राहत में भारी संदेह है। जहां तक हसीना के अब बांग्लादेश लौटने का प्रश्न है, यह लगभग असंभव लगता है। राजनीतिक प्रतिशोध, सुरक्षा जोखिम और सत्ता संरचना से उनका पूर्णतः हट जाना इसे नामुमकिन बना देता है।
हसीना और उनकी सरकार के पूर्व गृह मंत्री के भारत में मौजूद होने से पड़ोसी भारत के लिए भी स्थिति बेहद संवेदनशील है। एक तरफ उसे बांग्लादेश की वर्तमान सरकार से रिश्ते संभालने हैं, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और राजनीतिक प्रतिशोध विरोधी सिद्धांतों को भी बनाए रखना है। दोनों देशों के बीच प्रत्यार्पण संधि के बावजूद भारत के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक या दंडात्मक प्रतिशोध के खतरे की स्थिति में प्रत्यर्पित न करे। अंतर्राष्ट्रीय कानून भी इसे मान्यता देता है।
ढाका की नई सरकार के साथ उसके रिश्ते तनाव में न पड़ें, इस भय से भारत हसीना को लौटा देगा, ऐसा नहीं लगता। उन्हें न लौटाने में भारत को कूटनीतिक लाभ भी है, वह विश्व को यह संदेश दे सकता है कि भारत प्रतिशोधात्मक राजनीति या संदिग्ध न्यायिक प्रक्रियाओं का समर्थन नहीं करता। भारत को अपनी ‘नेबर फर्स्ट’ नीति के तहत आज अत्यंत संतुलित रणनीति अपनानी होगी।
बांग्लादेश से रिश्ते बिगड़े तो उत्तरपूर्व में स्थिति गड़बड़ा सकती है। हसीना का मामला दक्षिण एशियाई राजनीति की उस पुरानी बीमारी को फिर उजागर करता है, जिसमें सत्ता परिवर्तन प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का मौका लाता है। यह स्थिति भारत और पूरे क्षेत्र की सरकारों को यह सीख देती है कि विपक्ष के प्रति अतिशय कठोरता, संस्थाओं पर असंवैधानिक नियंत्रण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के क्षरण का दुष्परिणाम सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को कभी भी भुगतना पड़ सकता है।
