जीवन में संस्कारों से होती है व्यक्ति की पहचान
जीवन में अच्छे संस्कारों से अच्छे इंसान की पहचान की जाती है। दूसरी ओर हम यह कह सकते हैं कि अच्छे संस्कार बेहतर जीवन की नींव होते हैं। मानव जीवन में सबसे पहले दृश्य होने वाले भाव उसके संस्कार ही होते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो संस्कार बिन मनुष्य पशु समान है। अच्छे बुरे का भेद हमें संस्कारों से ही पता चलता है। बच्चे जो कुछ भी सीखते हैं वे सब संस्कारों की श्रेणी में फलता फूलता है। अच्छे संस्कार बेहतर कल का निर्माण करने में सहायक होते हैं। वास्तविकता पर प्रकाश डाला जाए, तो हमें ज्ञात होगा कि हमारे हर एक कार्य पर संस्कारों की छवि झलकती है। फिर चाहे वह कार्य छोटा हो या बड़ा, हमारा हर आचरण हमारे संस्कारों को ही दर्शाता है। भला ऐसे कौन से माता-पिता होंगे, जो अपने बच्चों को अच्छे संस्कारों से हीन देखना चाहते होंगे? - लेखक, शिवालिक अवस्थी,
बचपन से ही बच्चों को अच्छे संस्कारों दें
हम बात तो यहां अच्छे संस्कारों की कर रहे हैं, लेकिन बचपन से ही अच्छे संस्कारों का समावेश कैसे किया जाए यह बात ध्यान देने योग्य है। आईए इस पर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। बच्चों में अच्छे संस्कारों का सृजन माता-पिता द्वारा जीवन के शुरुआती दौर में ही कर देना चाहिए। बढ़ती उम्र के साथ बच्चों को हर एक संस्कार से रूबरू करवाना माता-पिता का कर्तव्य समझा जाता है। हर कार्य को सही ढंग से पूर्ण करना चाहिए, जिसके लिए बच्चों को अच्छे-बुरे की पहचान होना अनिवार्य हो जाता है। कौन सा कार्य अच्छा है और कौन सा कार्य बुरा है यह संस्कारों के अधीन ही समझा जाता है। सुबह उठते ही बच्चों द्वारा अपना बिस्तर समेटना, उनके संस्कार को दर्शाता है। दिनचर्या के कार्यो को सही ढंग से पूर्ण करना, संस्कारों की श्रेणी में आता है। भोजन कैसे ग्रहण किया जाता है यह भी संस्कारों में शामिल किया गया है।
अच्छे संस्कारों के कारण बच्चे अपने रोजमर्रा के कार्यों को सफलतापूर्वक करने में सक्षम बन जाते हैं। सही ढंग से भोजन ग्रहण करना सीख जाते हैं। बेहतर संस्कारों के कारण ही बच्चे, बड़ों का आदर सम्मान करना सीख जाते हैं। बच्चों को अच्छाई-बुराई का बोध भी अच्छे संस्कारों के कारण ही होता है। कौन सा कार्य करना उचित है और कौन सा अनुचित यह बच्चों को संस्कारों के ग्रहण करने से ज्ञात हो जाता है। आज के इस युग में कई जगह देखा जाता है कि बच्चों के जीवन से संस्कार लुप्त होते जा रहे हैं, जिस कारण बच्चों द्वारा कार्य करने के तरीके भी बदल चुके हैं। अब बच्चे बिना मोबाइल के भोजन तक ग्रहण नहीं करते हैं, जो सरासर गलत है। नतीजन भोजन पाचन क्रिया में कठिनता नजर आने लगी है। कई बच्चे तो एक ओर टीवी अथवा मोबाइल को देखने के लिए लेटे होते हैं, तो दूसरी ओर वह भोजन भी ग्रहण कर रहे होते हैं। अब इस क्रिया में बच्चों का पेट कैसे भरेगा और भोजन कैसे पचेगा यह समझ से परे है। नतीजन मोटापे या कुपोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर बच्चों में यदि संस्कार अच्छे होंगे, तो बच्चे भी बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकर आराम से भोजन ग्रहण करेंगे, जो जीवन में अति आवश्यक भी है। आजकल ज्यादातर बच्चों ने अपने से बड़ों के पांव छूकर आशीर्वाद लेने का महत्व भी खो दिया है। बच्चों को चाहिए कि वे रोज सुबह उठकर अपने माता-पिता के पांव छूकर स्कूल जाएं। स्कूल में अपने गुरुजनों का आशीर्वाद लिया जाए। अथवा घर में कोई मेहमान आए, तो उसके भी पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाए। यह क्रियाएं नैतिक संस्कारों की श्रेणी में आती हैं, जिनका प्रभाव जीवन भर रहता है। जीवन में स्वछता को अपनाना भी संस्कार माना गया है। इसलिए बच्चों को स्वछता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। स्वछता के अलावा सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना भी बच्चों के विशेष संस्कारों में सम्मिलित होना चाहिए। स्कूल की बात करें, तो बच्चों को अपने गुरुजनों का सदैव सम्मान करना चाहिए। अपने गुरु के कहे शब्दों को ध्यानपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। स्कूल के नियमों का पालन करना चाहिए और नियमों का पालन वही विद्यार्थी कर सकता है, जिसके भीतर संस्कारों का बीज अंकुरित किया जा चुका हो।
मोबाइल से बच्चों के दूर रखें
आज के समय में बच्चों में संस्कार मानो लुप्त होते जा रहे हैं। बच्चे चिड़चिड़ेपन का शिकार होते जा रहे हैं। बच्चे घर में आए मेहमानों से मिलने को कतराते हैं। अकेलेपन को ज्यादा पसंद करने लगे हैं। मोबाइल से ज्यादा लगाव लगाकर बैठे हैं। मानो बच्चों ने अपना बचपन ही बेच दिया हो। दुनिया की इस चकाचौंध में बच्चे अपना बचपन खो बैठे हैं। अब जरूरत है, तो बच्चों के खोए हुए बचपन को लौटाने की, जिसमें संस्कार अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों में ऐसे संस्कार निहित होने चाहिए, जिनसे वह जीवन का मूल मकसद समझ सकें। माता-पिता और गुरु यह तीन ऐसे मजबूत स्तंभ हैं, जो बच्चों में संस्कारों का निर्माण करने में सक्षम होते हैं। बच्चों के जीवन की नींव इन्हीं तीन स्तंभों पर टिकी होती है। बाहर हर बच्चा अक्सर वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह घर के वातावरण से सीखता है, इसलिए विशेष रूप से माता-पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चों में संस्कारों की ऐसी पैदावार करें, जो जीवनपर्यंत बच्चों के लिए फलदायक साबित हो।
