आपबीती: फिर जिले में कभी तैनाती नहीं ली
बात है वर्ष 1986 की, जिला बुलंदशहर में सीओ अनूप की तैनाती के तीन महीने में कप्तान साहब ने मेरे कार्यक्षेत्र के पांच थानों में फेरबदल करते हुए दो छोटे थाने हटाकर दो बड़े थाने पकड़ा दिए। अब अलीगढ़ सीमा से मुरादाबाद (अब अमरोहा जिला) सीमा तक गंगा किनारे का बड़ा इलाका पुलिसिंग के लिए मिल गया। नए मिले थानों के बारे में ब्रीफ किया गया कि साल के शुरुआती ढाई महीने में ही डकैती के एक दर्जन से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं और मेरे इलाके में अपराध कमोबेश कंट्रोल में है। नए लड़के हैं, जाकर इस इलाके में कंट्रोल कीजिए। उसी शाम एक कोतवाली पर पंहुचकर उपनिरीक्षकों से अपराध के बारे में चर्चा की। इंस्पेक्टर को क्राइम कंट्रोल मे विफल रहने के कारण हरिद्वार कुंभ मेला ड्यूटी भेज दिया गया था। बचे थाना पर तीन-चार नए और तीन पुराने दारोगा।- लेखक- अरुण गुप्ता पूर्व आईपीएस, उत्तर प्रदेश।
पुरानों दारोगाओं में सीनियर इंचार्ज पी. पी. सिंह शांत स्वभाव के और दिनभर मेहनत करने वाले अफसर थे। दूसरे यादव जी थे, लिखा-पढ़ी में इतने माहिर कि तफ्तीश में कोई भी नतीजा लिख दें, उसमें कमी निकाल पाना आसान नहीं होता था। तीसरे खुर्शीद गौहर- 50 से ऊपर की उम्र में सुंदर व शालीन व्यक्तित्व के मालिक, उतनी ही नफासत भरी बातचीत, मानो पश्चिमी उप्र में लखनऊ उतर आया हो। सेवा में नए होने के कारण पूरी गंभीरता से डकैतियों की रोकथाम की कार्ययोजना के बारे में पूछने पर जनाब खुर्शीद गौहर साहब ने लखनवी अंदाज में फरमाया- ‘हुजूर! अब आप का हुक्म है, तो नहीं पड़ेंगी।’ मेरी जिज्ञासा पर उन्होंने बतलाया- ‘साहब! मेहनत से गश्त की जाएगी। मुखबिरान मामूर (सक्रिय) किए जाएंगे। माशाल्लाह! आप भी जवान हैं, रात भर इलाके में घूमते ही रहते हैं। डकैती की क्या मजाल, जो पड़ जाएगी।’
इसके बाद अगले दो-ढाई महीनों तक उन नए थानों में डकैती तो दूर, चोरी-नकबजनी पर भी मानो ब्रेक सा लग गया। मासिक क्राइम मीटिंग में कप्तान साहब जब कहते कि नया लड़का है, कैसे क्राइम कंट्रोल कर रखा है, तो सीना खुद-ब-खुद चौड़ा हो जाता। इस बीच मंडल के डीआईजी साहब भी शाबासी दे गए। कुछ ही दिन बाद उसी थाना क्षेत्र के एक उभरते युवा नेता अपने शस्त्र लाइसेंस के प्रार्थना पत्र पर संस्तुति कराने के सिलसिले में मिलने आए। मैं खाली बैठा था, सो बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा।
बातों-बातों में नेताजी ने उक्त थाने के कामकाज की तारीफ करते हुए जो कहा, उसने मेरे पैरों तले से जमीन हिला दी। उन्हीं के शब्दों में- ‘साब, जबसे आपने हमारे थाने को संभाला है, पुलिस इतनी मेहनत कर रही है कि पूछिऐ मत। पहले तो रात में निकलता ही नहीं था कोई। अभी हाल में फलाने गांव मे डाका पड़ा, इतनी मेहनत करी पुलिस ने और पिछले महीने ढिमके गांव में डकैती पड़ी, साब, कितनी मेहनत की पुलिस वालों ने। गजब का सुधार हुआ है, आप के आने से...'
अब मुझे काटो तो खून नहीं। उन्हें विदाकर अपने बुजुर्ग पेशकार ओमप्रकाश सिंह तोमर को बुलाकर नेताजी की तारीफ के बारे में बतलाते हुए चिंता व्यक्त की। पेशकार बहुत अनुभवी थे। उन्होंने कहा कि कोई शिकायत तो नहीं आई है सर। ऊपर के अफसर भी कहां चाहते हैं कि क्राइम बढ़े। जब कोई शिकायत आएगी, तब कार्रवाई कर दीजिएगा।
मुझे परेशानी से उबरता न देखकर पेशकार साहब ने विभाग का रहस्य बतलाया कि सरकार से थानेदार तक कोई नहीं चाहता कि अपराध बढ़ता दिखाई दे। सब आंकड़ों का खेल है। अपराध के आंकड़े बढ़ने पर विपक्ष सरकार को घेर लेती है और सरकार अफसरों को। थानेदार लूट-डकैती नहीं लिखता है। अफसरों की नौकरी बचाने के लिए और चोरी-नकबजनी नहीं लिखता है, अपनी थानेदारी बचाने के लिए, लेकिन सच यह है कि डकैती न लिखने पर भी मौके पर सारी कार्रवाई का दिखावा करना पड़ता है, अपराधी भी पकड़े जाते हैं, बस उन्हें डकैती के बजाय डकैती की योजना बनाते हुए पुलिस मुठभेड़ में तमंचा आदि के साथ पकड़कर बंद कर दिया जाता है।
फिर उनकी पिटाई कर इतनी दहशत भर दी जाती है कि वह महीनों जमानत नहीं कराते। अभी जो बदमाश मुठभेड़ में मारे गए हैं, वह सभी शातिर लुटेरे हैं। बाकी क्राइम कंट्रोल मिमिमाइजेशन (अपराध को हल्के धाराओं में दर्ज करना) और कंसीलमेंट (अपराध को बिल्कुल न लिखना) पर ही चल रहा है पूरे सूबे में। इसके बाद मेरे ज्ञान चक्षु खुल गए और मैंने कभी जिला पुलिस में तैनाती के लिए कोशिश नहीं की और नौकरी का बड़ा हिस्सा इंटेलिजेंस, विजिलेंस और सुरक्षा में बिताकर आज से साढ़े आठ साल पहले रिटायर हो गया।🙏🙏
