संपादकीय :फिर नीतीश नेतृत्व
बिहार में बंपर बहुमत वाली ऐसी सरकार बनी है, जिसके मुख्यमंत्री के साथ दोनों उप मुख्यमंत्री और कतिपय मंत्री भी पुरानी ही सरकार से हैं। सत्ता का यह समीकरण परोक्षत: राजनीतिक स्थिरता का संदेश देता है, परंतु इसके पीछे जटिल सामरिक मजबूरियां छिपी हैं। युवा, ऊर्जावान चेहरे को आगे न लाने के पीछे यह तर्क दिया जा सकता है कि गठबंधन की राजनीति और जातीय-सामाजिक संतुलन की अनिवार्यता इसकी वजह बनी, लेकिन सही तो यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दोनों उपमुख्यमंत्रियों को रिपीट किए जाने का मतलब है कि भाजपा और जदयू- दोनों ही साझेदार अभी किसी नए चेहरे के प्रयोग का जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं।
सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा का अपना मुख्यमंत्री न देने का निर्णय रणनीतिक है। तत्काल नेतृत्व परिवर्तन से सामाजिक-राजनीतिक असंतुलन उत्पन्न होने का खतरा था, हालांकि नीतीश कुमार के ‘अल्पकालिक मुख्यमंत्री’ होने की चर्चा आम है। उनके स्वास्थ्य ने आशंका बढ़ाई है कि वे लंबी पारी नहीं खेलेंगे। राजनीतिक मजबूरियों के तहत उन्हें जिम्मेदारी तो मिली है, पर यह भी सच है कि भाजपा भविष्य में बिहार का नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाहेगी। फिलहाल नीतीश उसके लिए एक ‘ट्रांजिशनल फिगर’ की तरह अधिक उपयोगी हैं।
बिहार में पिछले डेढ़ दशक में सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में सुधार हुआ है, परंतु बेरोजगारी, पलायन, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति धीमी रही। राज्य आज भी निवेश आकर्षित करने में पिछड़ा है। 50 लाख करोड़ बाहरी निवेश का वादा राजनीतिक जुमला है। सुरक्षा, कौशल, आधारभूत ढांचे और प्रशासनिक दक्षता सुधारे बिना यह लक्ष्य आशावादी से अधिक अव्यावहारिक प्रतीत होता है। नीतीश कुमार के लंबे शासनकाल की उपलब्धियां मिश्रित रही हैं।
उन्होंने बुनियादी शासन-व्यवस्था को स्थिर बनाया, परंतु उद्यम, उद्योग, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बिहार अब भी देश के निचले पायदानों पर है। आने वाले दिनों में नई सरकार से उम्मीद रहेगी कि वह रोजगार, स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार, निवेश और उद्योग-संबंधी सुधारों पर गंभीरता से कार्य करे। कमजोर विपक्ष नयी सरकार के लिए फायदेमंद है। कम सवाल, कम निगरानी और बिना बाधा विधेयकों के पारित होने की सहूलियत, परंतु यह उतना ही खतरनाक भी है, क्योंकि जवाबदेही का दबाव घटने से शासन में ढिलाई की आशंका रहती है।
भाजपा और जदयू ने इस चुनाव में कई बड़े बड़े वादे किए हैं। बुनियादी ढांचा, रोजगार, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, निवेश, कौशल विकास, लेकिन इतिहास बताता है कि पिछली सरकार अपने अधिकाधिक वादों को पूरा नहीं कर पाई। इस कार्यकाल में वादों की पूर्ति की संभावना इसलिए कम है, क्योंकि गठबंधन की आंतरिक खींचतान और भविष्य की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पहले से ही दिखाई दे रही हैं। आने वाले वर्षों में भाजपा अधिक सीटों पर दावा ठोकने की तैयारी करेगी, जिससे सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ेगा। बिहार की जनता की अपेक्षाएं बहुत स्पष्ट हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन। प्रश्न है कि क्या यह रिपीट सरकार इन अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी?
