मानद उपाधियां: घटता सम्मान, बढ़ता व्यापार

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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शिक्षा के पवित्र क्षेत्र में पिछले कुछ समय में एक विचित्र प्रवृत्ति उभर आई है। देश-विदेश की तमाम तथाकथित संस्थाएं रुपये लेकर लोगों को ‘डॉ.’ बना रही हैं। जो उपाधि कभी उपलब्धि का प्रतीक थी, अब दिखावे और प्रचार का माध्यम बन गई है। ऑनरेरी (मानद) डॉक्टरेट, जिसका उद्देश्य असाधारण योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करना था अब पैसों के लेन-देन का औजार बन गई है। इंटरनेट पर ऐसे प्रमाणपत्र आसानी से उपलब्ध हैं- बस भुगतान कीजिए, एक ‘ग्लोबल समिट’ में मंच पर फोटो खिंचवाइए और नाम के आगे “डॉ. (Dr.)” जोड़ लीजिए, जो कभी उपलब्धि का प्रतीक था, अब प्रदर्शन का औजार बन गया है।-शिवम भारद्वाज

ऑनरेरी डॉक्टरेट या मानद उपाधि का मूल विचार बहुत ही गरिमामय था। इसका उद्देश्य उन व्यक्तियों को सम्मानित करना था, जिन्होंने समाज, विज्ञान, साहित्य, कला या मानवता के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया हो। पश्चिम में ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड या कैंब्रिज जैसे विश्वविद्यालय जब ऐसी उपाधियां देते हैं, तो यह स्पष्ट कर देते हैं कि यह शैक्षणिक डिग्री नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक सम्मान है। भारत में भी कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय यह परंपरा निभाते हैं। उद्देश्य केवल सम्मान देना है, न कि ‘डॉक्टर’ कहलाने का अधिकार प्रदान करना।

क्या कहता है कानून

कानून भी इस भेद को स्पष्ट करता है। यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 22 के अनुसार, ‘डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी’ या ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ जैसी उपाधियां केवल वही विश्वविद्यालय प्रदान कर सकते हैं, जिन्हें विधिवत मान्यता प्राप्त है। कोई भी निजी संस्था या पंजीकृत सोसायटी ऐसा करने का अधिकार नहीं रखती। इसके बावजूद, सोशल मीडिया पर सैकड़ों ‘इंटरनेशनल यूनिवर्सिटीज’ और ‘ग्लोबल काउंसिल्स’ सक्रिय हैं, जो विदेशी नामों और सुनहरी मोहरों वाले आकर्षक प्रमाणपत्र थमा रही हैं। इन प्रमाणपत्रों का कोई शैक्षणिक मूल्य नहीं होता, फिर भी इन्हें लेने वाले अपने विजिटिंग कार्ड, सोशल मीडिया प्रोफाइल और नामपट्ट पर ‘Dr’ जोड़ लेते हैं।

यह सब इतना गंभीर क्यों है? इसलिए कि यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि शिक्षा की नैतिकता पर सीधा प्रहार है। जो व्यक्ति वर्षों की मेहनत, शोध और मार्गदर्शन के बाद डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित करता है, उसका श्रम उस समय बेमानी हो जाता है, जब कोई व्यक्ति कुछ हज़ार रुपये देकर वही उपाधि ‘सम्मान’ के नाम पर हासिल कर लेता है। असली डॉक्टरेट के पीछे कठोर अनुसंधान, थीसिस, समीक्षाएं और प्रकाशन की प्रक्रिया होती है, जबकि इन ‘ऑनरेरी उपाधियों’ के पीछे सिर्फ़ एक पेमेंट लिंक होता है।

भ्रामक प्रतिष्ठा

यह प्रवृत्ति केवल शिक्षा की साख नहीं गिरा रही, बल्कि समाज में ज्ञान की विश्वसनीयता भी तोड़ रही है। जब कोई व्यक्ति अपनी सोशल मीडिया बायो में ‘Dr.’ जोड़ लेता है, तो लोग उसे विशेषज्ञ मान लेते हैं चाहे वह असल में किसी विषय का प्राथमिक ज्ञान भी न रखता हो। ऐसे लोग अक्सर ‘लाइफ कोच’, ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ या ‘ग्लोबल एंबेसडर’ के रूप में सामने आते हैं और ‘ऑनरेरी डॉक्टरेट’ को अपनी योग्यता का प्रमाण बना लेते हैं। यह समाज में भ्रामक प्रतिष्ठा और झूठे अधिकार का भ्रम पैदा करता है। यह आचरण केवल भ्रामक नहीं, बल्कि यदि जानबूझकर किसी को भ्रमित करने या व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जाए, तो कानूनन धोखाधड़ी की श्रेणी में भी आ सकता है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि यह सच्चे शोधकर्ताओं और विद्वानों की मेहनत का अनादर है, शिक्षा की गरिमा और ईमानदारी दोनों पर धब्बा है।

यह भी सच है कि दोष केवल इन संस्थाओं का नहीं। उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी उस मौन स्वीकृति की है, जो समाज देता है। मंचों पर ऐसे लोगों को ‘डॉ.’ कहकर बुलाया जाता है, उन्हें सम्मानित किया जाता है, मीडिया में उनके ‘अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ की खबरें छपती हैं। तालियों की वह गूंज नकली उपाधियों को वैधता दे देती है। धीरे-धीरे असली और नकली के बीच की रेखा मिटने लगती है। 

इस प्रवृत्ति पर सख्ती जरूरी

यूजीसी समय-समय पर फर्जी विश्वविद्यालयों और अवैध उपाधियां बांटने वाली संस्थाओं की सूची जारी करता है, परंतु फिर भी बड़ी संख्या में लोग इनके जाल में फंस रहे हैं। विदेशी नामों, अंग्रेजी आभा और तथाकथित ‘ग्लोबल’ पहचान का आकर्षण हमारे समाज की उस मानसिकता को भी उजागर करता है, जहां दिखावे को सार से अधिक महत्व दिया जाता है। यह शिक्षा नहीं, प्रतिष्ठा का सौदा है। जब सम्मान बिकने लगता है, तो वह सम्मान नहीं रहता- वह विज्ञापन बन जाता है। इस प्रवृत्ति पर सख्ती जरूरी है। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को ऐसे संस्थानों और उनसे उपाधि लेने वालों के विरुद्ध निरंतर और ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही समाज को भी अपनी सोच में परिपक्वता लानी होगी। ऑनरेरी डॉक्टरेट का असली अर्थ सम्मान में निहित है, व्यापार में नहीं। जब यह खरीदी जाती है, तो ‘सम्मान’ शब्द अपनी गरिमा खो देता है और शिक्षा, जो समाज की आत्मा है- सिर्फ दिखावे का मुखौटा बन जाती है। शिक्षा का सार ज्ञान है और ज्ञान का सार ईमानदारी, जब उपाधियां बिकने लगती हैं, तो शिक्षा का अर्थ ही खो जाता है। मानद डॉक्टरेट का वास्तविक सौंदर्य उसकी विनम्रता में है। सम्मान देने और पाने, दोनों की मर्यादा में। यह परंपरा तभी जीवित रह सकती है, जब इसे दिखावे, प्रचार और पैसों की पहुंच से बचाया जाए। डॉक्टरेट की उपाधि का मूल्य उसकी कठिनाई और श्रम में है। उसे खरीदा नहीं जा सकता, केवल अर्जित किया जा सकता है। इसलिए किसी नाम के आगे “डॉ.” देखकर अंधविश्वास न करें, बल्कि यह जानें कि उपाधि कहां से और किस आधार पर प्राप्त की गई है। यही समझ जब समाज में फिर से स्थापित होगी, तब ‘सम्मान’ अपनी खोई हुई ऊंचाई पर लौट आएगा।

 

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