मेरा शहर मेरी प्रेरणा: सेनानियों ने बरेली की नींव खून-पसीने से सींची तो जनप्रतिनिधियों ने समृद्ध बनाने को किए कार्य

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

बरेली को ‘समृद्ध बरेली’ बनाने की दिशा में देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भी बड़ा योगदान दिया है। 15 अगस्त, 1947 की बेला पर तिरंगा लहराने वाले दीवानों ने भारत माता को अंग्रेजी बेड़ियों से आजादी दिलाने के बाद बरेली की नींव को मजबूत करने का काम किया। बरेली के ऐसे 20 से अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं, जिन्होंने लोकसभा, विधानसभा, नगर पालिका परिषद में बतौर सदस्य रहकर बरेली को समृद्ध बनाने के लिए खून पसीना बहाया। 

इनके साथ कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनके घरों के सपूतों ने युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति का चोला ओढ़कर रोजगार, उद्योग धंधे की नींव को मजबूत किया। 1952 में बरेली के पहले सांसद सतीश चंद्र बने थे। इनके बाद बरेली को संवारने में राजनेताओं में सबसे बड़ा नाम संतोष गंगवार का आता है। आठ बार सांसद रहने के दौरान उन्होंने बरेली को छोटे से बड़ा आकार लेते देखा और समृद्ध बनाने में अहम योगदान दिया। राजवीर सिंह, कुंवर सर्वराज सिंह, दिनेश जौहरी, धर्मदत्त वैद्य और राममूर्ति कई ऐसे चर्चित चेहरे हैं, जिन्होंने बरेली को आगे बढ़ाया है। राजनीति में साबिर परिवार की तीसरी पीढ़ी काम कर रही है। अमृत विचार के छठें स्थापना दिवस के मौके पर हम आपको उन राजनेताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से रूबरू करा रहे हैं, जो बरेली को सशक्त बरेली बनाकर यहां तक लेकर आए हैं। आईए जानें उनके बारे में...

rammurti

राममूर्ति ने आम जनता को समृद्ध करने को अपना पहला कर्तव्य समझा
20 वर्ष की उम्र में पहली बार देश के लिए जेल गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममूर्ति का बरेली को समृद्ध बनाने में काफी योगदान रहा है। 1941 में बरेली के बहरपुरा में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू कर राममूर्ति देश को आजादी दिलाने के आंदोलन में कूदे थे। राममूर्ति ऐसे शख्सियत थे कि अंग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण के समय 1946 में जनता ने उन्हें भारी बहुमत से उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बनाया। इसके बाद 1968 तक लगातार विधानसभा में अपने क्षेत्र की नुमाइंदगी करते रहे और 1974 में फिर विधानसभा सदस्य चुने गए थे। उन्होंने आचार्य बिनोवा भावे के भूमि दान कार्यक्रम का समर्थन करते हुए अपनी 30 एकड़ कृषि भूमि अनुदान में दान कर दी थी। 

उन्होंने 19 वर्षों तक मंत्री रहकर बरेलीवासियों की सेवा की।  स्वतंत्रता सेनानी राम मूर्ति का जन्म 8 फरवरी 1910 में बरेली स्थित गांव धौरा में जमींदार साहू ठाकुर दास के यहां हुआ था। घर में सबसे छोटे राम मूर्ति की प्रारंभिक शिक्षा बरेली में ही हुई। जबकि उन्होंने स्नातक की शिक्षा वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। राममूर्ति ने परास्नातक की शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से हासिल की। स्नातक की शिक्षा के दौरान वाराणसी में राममूर्ति, महामना मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आए। मालवीय जी ने उन्हें बालंटियर बनाकर इलाहाबाद कुंभ में सेवा के लिए भेजा। विश्वविद्यालय परिसर के स्वच्छता की जिम्मेदारी भी दी। इन कामों को जिम्मेदारी से करने से राममूर्ति मालवीय जी के काफी करीब आ गए और स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी करने लगे। 

मालवीय जी के निर्देश पर वह वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में शामिल होने मुंबई (तत्कालीन बंबई) गए थे। वहां से वापस लौटते समय हमीरपुर में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। मात्र 20 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए राममूर्ति पहली बार गिरफ्तार हुए थे। महात्मा गांधी से प्रभावित राममूर्ति ने उनके सभी आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। मार्च 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्हें गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी विचित्र नारायण शर्मा के साथ अंग्रेजों ने फिर गिरफ्तार किया था। राममूर्ति ने 1941 में बरेली के बहरपुरा में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया। पिता की इच्छा का पालन करते हुए वे हाथी पर बैठकर सत्याग्रह में शामिल हुए। सात जनवरी 1941 को हाथी पर बैठकर वह जुलूस के साथ थाने पहुंचे और वहां अपनी गिरफ्तारी दी।गांधी जी के आह्वान पर 1942 में शुरू होने वाले भारत छोड़ो आंदोलन से पहले ही अंग्रेजों ने राममूर्ति को गिरफ्तार लिया था। 

हर बार की तरह इस बार भी उन्हें दो वर्ष से ज्यादा जेल में बिताने पड़े। मधुर और मिलनसार स्वभाव के राममूर्ति को पं. गोविंद बल्लभ पंत, डॉ. संपूर्णानंद, सीबीगुप्ता और सुचेता कृपलानी ने मंत्री बनाकर अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया। राममूर्ति अपनी ही सरकार के अत्याचार का विरोध करने से पीछे नहीं रहे थे। इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले का उन्होंने पुरजोर विरोध किया। बरेली में कचहरी पर सत्याग्रह किया, जहां सरकार के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। उन्होंने हमेशा आम जनता को समृद्ध करने को अपना पहला कर्तव्य समझा और उनके हितों को प्राथमिकता दी। राममूर्ति ने स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली पेंशन लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उनका मानना ​​था कि मातृभूमि के लिए उन्होंने जो कुछ भी किया, वह देशभक्ति के लिए था, न कि भौतिक लाभ के लिए। राममूर्ति  ने 2 अक्टूबर 1988 को बैकुंठ धाम के लिए महाप्रयाण किया था। उनकी विरासत को अब उनके पुत्र देवमूर्ति सींच रहे हैं। देवमूर्ति ने अपने पिता राममूर्ति के नाम पर मेडिकल कॉलेज बनवाया और चिकित्सा जगत में विशेष पहचान बनाई है। 

बरेली की पृष्ठभूमि सेनानियों  राजनेताओं से भरी पड़ी  
जिला प्रशासन के सरकारी आंकड़ों की बात करें तो उनके रिकार्ड में जनपदभर के 398 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का इतिहास दर्ज है। रिकार्ड देखने पर इन्हीं में से 20 से अधिक ऐसे सेनानियों की गाथा सामने आई, जिन्होंने लोकसभा और विधानसभा का सदस्य, जिला परिषद और नगर पालिका बरेली के चेयरमैन और सदस्य के रूप में भी लंबे समय तक कार्य कर बरेली को समृद्धि की ओर से ले जाने का काम किया। गौर करने की वाली बात यह है कि बरेली की पृष्ठभूमि सेनानियों और राजनेताओं से भरी पड़ी है। 

आजादी में अहम भूमिका निभाने के साथ पालिका के अंग बन बरेली संवारी
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे आजमनगर निवासी अब्दुल रऊफ ने बरेली नगर पालिका के अध्यक्ष रहकर बरेली शहर को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ दिनों के लिए नजरबंद रहने वाले अब्दुल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे। बताते हैं कि अब्दुल वाजिद आनरेरी मजिस्ट्रेट का पद त्यागकर कांग्रेस में शामिल हुए थे और 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और एक वर्ष जेल में रहे। सेंट्रल असेंबली के सदस्य रहने के साथ बरेली नगर पालिका के अध्यक्ष भी रहे। वहीं, कूंचा रतनगंज निवासी गोपीनाथ साहू पुत्र कंटी लाल ने आजादी की अलख जगाने को जेल भी काटी। 1930 और 1940 में छह और नौ माह की सजा हुई। वह नगर पालिका बरेली के सदस्य रहे और जिला व कांग्रेस शहर कमेटी के अध्यक्ष भी रहे थे। बमनपुरी निवासी जियाराम सक्सेना अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहने के साथ नगर पालिका बरेली के चेयरमैन भी रहे।

abida

पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद पत्नी आबिदा ने दो बार संसद में बरेली का नेतृत्व किया
भारत के पांचवें पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबदा ने संसद में दो बार बरेली का नेतृत्व किया। बरेली संसदीय क्षेत्र से वह दो बार सांसद चुनी गईं। आबिदा बेगम राजनीति में अलग शैली के लिए जानी जाती थीं। वर्ष 1984 के चुनाव से पहले इंदिरा गांधी उनके समर्थन में रैली करने के लिए नवाबगंज आई थीं। रामलीला मैदान में बनाए गए जनसभा स्थल पर दोनों हेलिकॉप्टर से एक साथ पहुंची थीं। अलग-अलग पार्टी होने के बावजूद वह भगवत सरन गंगवार के घर खाना खाने भी गई थीं। इंदिरा गांधी की इतनी करीबी थीं कि संसदीय क्षेत्र से संबंधित जनसमस्याओं को लेकर वह सीधे इंदिरा गांधी को फोन लगवा देती थीं। 1981 में उन्होंने यहां से पहला चुनाव जीता। बाहरी प्रत्याशी होने के बावजूद जनता ने वर्ष 1984 के चुनाव में दूसरी बार भी उन्हें चुनकर संसद पहुंचाया था। वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में आबिदा बेगम को संतोष गंगवार से हार का सामना करना पड़ा था। 

 

संबंधित समाचार