टूटती सदन की गरिमा
कर्नाटक विधानसभा में मंगलवार को गोरक्षा कानून पर कार्यवाही के दौरान जमकर हंगामा हुआ। मामला इतना बढ़ा कि हाथापाई की नौबत आ गई। कांग्रेस के सदस्यों ने चेयरमैन की कुर्सी पर बैठे डिप्टी चेयरमैन को बलपूर्वक उठा दिया। उनके साथ धक्का-मुक्की और खींचतान की गई। किसी भी सदन में इस तरह की घटना न सिर्फ …
कर्नाटक विधानसभा में मंगलवार को गोरक्षा कानून पर कार्यवाही के दौरान जमकर हंगामा हुआ। मामला इतना बढ़ा कि हाथापाई की नौबत आ गई। कांग्रेस के सदस्यों ने चेयरमैन की कुर्सी पर बैठे डिप्टी चेयरमैन को बलपूर्वक उठा दिया। उनके साथ धक्का-मुक्की और खींचतान की गई। किसी भी सदन में इस तरह की घटना न सिर्फ अशोभनीय है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने गए सदस्यों के लिए जरूरी आचरण के सर्वदा विपरीत है। किसी भी सदन के सदस्य से मर्यादा की उम्मीद इसलिए की जाती है क्योंकि वे जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में, उनसे आदर्श आचरण की अपेक्षा होती है लेकिन वही यदि अशोभनीय कृत्य करेंगे तो फिर समाज को क्या संदेश दे पाएंगे।
कर्नाटक विधान परिषद में अराजकता की यह घटना समूचे लोकतांत्रिक ढांचे की मर्यादा पर ही सवाल खड़े करती हैं। इसके लिए जिम्मेदार सदस्यों की भर्त्सना की जा रही है तो इसमें गलत कुछ नहीं है। हालांकि पहले भी संसद और उत्तर प्रदेश विधानसभा तथा अन्य राज्यों के सदन में सदस्यों की ओर से मर्यादा के विपरीत आचरण किया गया है। कर्नाटक विधान परिषद की घटना हालिया मामला है लेकिन इसके हवाले से सदन में होने वाली ऐसी अराजक घटनाओं के लिए जिम्मेदार सदस्यों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जाने चाहिए। सदन कोई भी हो, वह देश और जनता के लिए अहम निर्णय लेता है। यहां तक कि नए कानून बनाने जैसा काम भी इन्हीं सदन में होता है और उनमें ही जब कानून टूटने लगे तो फिर इनकी विश्वसनीयता कहां रह जाती है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में होने वाले चुनाव में वोट के जरिए हम जिन्हें अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। उनमें उच्च नैतिक आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादा का आदर्श स्थापित करने वाले आचरण की अपेक्षा करते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये जनप्रतिनिधि लाखों-करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह बात सही है कि विपक्ष का काम ही है कि वह सत्ता पक्ष की सही न लगने वाली नीतियों और निर्णयों का विरोध करे लेकिन सदन के अंदर इस तरह से विरोध लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सदन की मर्यादाओं को तिलांजलि देकर या आचरण को दरकिनार करके किया जाए तो वह विरोध नहीं बल्कि अराजकता हो जाता है। इसलिए विपक्ष तो सीमा पार करता ही है, सदन में अमर्यादित आचरण करके सत्ता पक्ष भी भूल जाता है कि जनता के सामने सदन की गरिमा, मर्यादा और आदर्श आचरण प्रस्तुत करने की उसकी िजम्मेदारी कहीं ज्यादा है।
