संपादकीय: ग्रामीण नीति में बड़ा मोड़

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Edited By Amrit Vichar
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लोकसभा द्वारा दो दशकों से लागू मनरेगा की जगह रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 का पारित होना ग्रामीण भारत की नीति-दिशा में एक ऐतिहासिक बदलाव है। यह बदलाव केवल नाम का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं और शासन-ढांचे का भी है। नई व्यवस्था ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगी या फिर रोजगार गारंटी को कमजोर करेगी, यह कुछ बरस बाद पता चलेगा। निःसंदेह बीते 20 वर्षों में ग्रामीण भारत की तस्वीर बदली है। 

सड़कों, बिजली, इंटरनेट और डिजिटल भुगतान ने गांवों को मुख्यधारा से जोड़ा है। गैर-कृषि रोजगार भी बढ़े हैं। मनरेगा के तहत औसतन 100 दिन की गारंटी के बावजूद मजदूरों को साल में केवल 50–55 दिन ही काम मिल पाया। ऐसे में सरकार का मानना था कि पुरानी योजना प्रासंगिक नहीं रही, आजीविका और उत्पादकता पर केंद्रित नया कानून जरूरी था। जल, जलवायु और आधारभूत ढांचे पर केंद्रित नई योजना जल सुरक्षा, जल-संरक्षण, ग्रामीण परिसंपत्तियों और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कार्यों को प्राथमिकता देकर पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक प्रासंगिक बन सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों को जल-संकट और जलवायु जोखिमों से निपटने में मदद कर सकती है। 

पारदर्शिता के मोर्चे पर बायोमेट्रिक उपस्थिति, डिजिटल भुगतान और कड़ी निगरानी व्यवस्था जैसे भ्रष्टाचार-निरोधक तकनीकी उपायों से लीकेज घटेगा तो, पर भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म तभी होगा जब स्थानीय स्तर पर जवाबदेही और सामाजिक अंकेक्षण मजबूत हों। योजना के कुछ प्रावधान गंभीर सवाल खड़े करते हैं। खेती के सीजन में 60 दिनों तक योजना का काम बंद रहेगा, ताकि खेती के लिए मजदूर मिल सकें, लेकिन यह अवधि केंद्र सरकार तय करेगी। आशंका यह है कि मजदूरों की उपलब्धता बढ़ने से उनकी मजदूरी की सौदेबाज़ी की ताकत घटे और दिहाड़ी पर दबाव पड़े। 

125 दिनों के रोजगार की गारंटी कागज़ पर आकर्षक है, पर जब पुरानी योजना में 100 दिनों की गारंटी भी पूरी नहीं हो पाई, तो नई गारंटी पर भरोसा कैसे किया जाए? वित्तीय ढांचे में भी बड़ा बदलाव है। अब केंद्र 60 प्रतिशत और राज्य 40 फीसदी खर्च वहन करेंगे। इससे राज्यों पर भारी बोझ पड़ेगा। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों पर यह अतिरिक्त बोझ 3,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है। बंगाल, झारखंड और पंजाब जैसे राज्यों ने इस योजना को लेकर असहमति जताई है, उनके पीछे यही वित्तीय और प्रशासनिक चिंता है। जब अधिकांश अधिकार केंद्र के पास होंगे, तो संसाधन-संकट से जूझ रहे राज्य इसमें कितनी रुचि लेंगे, यह बड़ा प्रश्न है। 

यदि राज्यों ने काम कम दिया या योजना को गंभीरता से नहीं लिया, तो काम न मिलने की स्थिति में गरीब ग्रामीण परिवारों की हालत और खराब हो सकती है। यही कारण है कि यह बदलाव ग्रामीण नीति के सबसे अहम मोड़ों में गिना जाएगा। फिलहाल नई व्यवस्था का वास्तविक असर रोजगार, कृषि उत्पादकता, आय और पर्यावरण पर कम से कम 2–3 वर्षों में ही साफ होगा। इतना तय है कि यह कदम अवसर के साथ जोखिम भी है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या सरकार रोजगार गारंटी की आत्मा को बचाते हुए पूरी ईमानदारी से ग्रामीण आजीविका और पर्यावरण के लक्ष्यों को संतुलित कर पाती है या नहीं।