आंदोलन का अधिकार

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Edited By Amrit Vichar
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केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि हम इस आंदोलन को खत्म नहीं कर सकते। किसी भी कानून के खिलाफ प्रदर्शन करना नागरिक का मौलिक अधिकार है। बुधवार को न्यायालय …

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। गुरुवार को उच्चतम
न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि हम इस आंदोलन को खत्म नहीं कर सकते।

किसी भी कानून के खिलाफ प्रदर्शन करना नागरिक का मौलिक अधिकार है। बुधवार को न्यायालय ने किसानों से बातचीत के लिए समिति गठित करने को कहा। प्रस्तावित समिति इस समस्या का हल निकालेगी। क्योंकि सरकार किसानों से बात करके इसका हल नहीं निकाल पाई है।

उन्होंने कहा कि समिति एक निर्णय करेगी जिसका पालन सरकार और किसानों दोनों को करना होगा। समिति के गठन और
निर्णय तक किसानों का आंदोलन जस का तस चल सकता है। एक घटना के रूप में 2020 का किसान आंदोलन कई वृतांतों का
कोलाज है। इसकी तुलना सात अंधे पुरुषों और हाथी की कहानी से की जा सकती है। जैसे ही 21 दिन पहले किसानों ने सिंघू बार्डर से
दिल्ली में प्रवेश किया था।

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने अपनी विशिष्ट शैली में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। दावा किया गया कि खालिस्तानियों और नक्सलियों की आंदोलन में घुसपैठ है। उनकी परिभाषा के अनुसार किसान एक शासन के लिए राष्ट्र-विरोधी हो गया। जैसे-जैसे दिन आगे बढ़े, एक बात स्पष्ट होती रही, संघर्ष एक किंवदंती की स्थिति प्राप्त कर रहा है। अछूता, अलग-थलग और विभाजित दिखने के बजाय संघर्ष एकजुट रहा है। स्पष्ट है कि किसान शासन का विरोध कर रहे हैं।

आंदोलन में संघर्ष की शक्ति और सीमा स्पष्ट है। संघर्ष की एकता और बहुलता स्पष्ट है। आंदोलन में दर्जनों किसान समूह शामिल है।
इस बीच बॉलीवुड ने हड़ताल की अखंडता पर सवाल उठाने के दृश्य में प्रवेश किया। हरियाणा की दंगल गर्ल बबिता फोगाट ने
किसान आंदोलन को टुकड़े-टुकड़े गैंग द्वारा हाईजैक करने का आरोप लगाया।

हालांकि किसान आंदोलन के पक्ष में प्रसिद्ध कवि सुरजीत पातर और कितने ही ओलम्पिक खिलाड़ियों ने अपने-अपने अवार्ड लौटाने की घोषणा की। सुखबीर बादल का कहना है कि जिन लोगों ने यह काले कानून बनाए उन्होंने कभी खेती की ही नहीं। उन्हें खेती के बारे में पता ही नहीं कुछ। ये आरोप वे दल लगा रहे हैं जो भाजपा का साथ देते आ रहे थे।

कांग्रेस कह रही है कि प्रधानमंत्री को इन कानूनों को वापस ले लेना चाहिए। हठधर्मिता का रवैया छोड़कर केंद्र को पुनर्विचार करना चाहिए। यहां आंदोलन से निपटने
में भाजपा की कल्पना की कमी स्पष्ट है।