संपादकीय: सफलता भरी शुरुआत
भारत के रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र ने नव वर्ष का आरंभ उपलब्धियां हासिल करके की हैं, ये मात्र तकनीकी सफलताएं नहीं, बल्कि देश की बदलती सामरिक सोच और आत्मनिर्भरता का स्पष्ट संकेत हैं। एक ओर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने एक ही लॉन्चर से दो प्रलय मिसाइलें दागकर अपनी मारक क्षमता का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने छोटे उपग्रह प्रक्षेपण के तीसरे चरण का सफल जमीनी परीक्षण कर अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई।
रक्षा और अंतरिक्ष—दोनों मोर्चों पर यह साल का समापन भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रलय मिसाइल को एक ही लॉन्च में दो अलग-अलग लक्ष्यों पर सटीक प्रहार करने की क्षमता के कारण बेहद कारगर हथियार माना जा रहा है। इसकी अनुमानित रेंज 150 से 500 किलोमीटर के बीच है और यह उच्च सटीकता के साथ दुश्मन के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकती है। युद्ध की स्थिति में ‘डबल अटैक’ क्षमता दुश्मन के एयरबेस, बंकरों, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक हब को एक साथ पंगु बनाने में निर्णायक साबित हो सकती है।
जब एक जगह पर हमला होता है और उसी समय दूसरे स्थान पर भी हो, तो दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता। यह तकनीक उसके प्रतिक्रिया समय को घटाती है और उसे रणनीति बनाने का अवसर नहीं देती। इस मिसाइल की यह खूबी इसे युद्ध की स्थिति में ‘गेम चेंजर’ बनाती है। प्रलय जो एक क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल है, यानी यह उड़ान के दौरान अपना रास्ता बदल सकती है और दुश्मन के रडार व एयर-डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है।
चीन के पास डीएफ-सीरीज़ और पाकिस्तान के पास अब्दाली-नस्र जैसे हथियार हैं, लेकिन भारत की प्रलय आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित स्वदेशी प्रणाली है। लिक्विड या तरल नोदक भरने में समय लगता है। इसमें ठोस ईंधन यानी सॉलिड प्रोपेलेंट का उपयोग इसे ‘रेडी-टू-फायर’ बनाता है, जिससे बहुत कम समय में लॉन्च संभव होता है। लांचिंग की यह तीव्रता और विशेष तकनीकी इंटरसेप्ट करना कठिन बनाती है और इसे विश्व की प्रभावशाली मिसाइल प्रणालियों की कतार में खड़ा करती है। हालिया परीक्षण संकेत देता है कि यह प्रणाली सेना के बेड़े में शामिल होने के लिये तैयार है, जिससे भारतीय सशस्त्र बलों की सामरिक ताकत बढ़ जाएगी।
यह उपलब्धि भारत की रक्षा नीति में एक सूक्ष्म, लेकिन स्पष्ट बदलाव का संकेत भी देती है। अब केवल रक्षात्मक क्षमता नहीं, बल्कि सटीक और सीमित आक्रामक प्रतिरोध पर जोर है। इसी कड़ी में इसरो द्वारा एसएसएलवी के तीसरे चरण का जमीनी परीक्षण भविष्य के लिए अत्यंत अहम है। एसएसएलवी भारत को छोटे उपग्रहों के त्वरित और किफायती प्रक्षेपण में वैश्विक बाजार का बड़ा खिलाड़ी बना सकता है। रक्षा, संचार और आपदा प्रबंधन के लिए छोटे उपग्रहों की बढ़ती मांग को देखते हुए यह सफलता रणनीतिक भी है। नए वर्ष में डीआरडीओ से हाइपरसोनिक, ड्रोन-रोधी और उन्नत वायु-रक्षा प्रणालियों पर प्रगति की उम्मीद है, वहीं इसरो गगनयान, नए लॉन्च वाहनों और व्यावसायिक मिशनों में आगे बढ़ सकता है
