संपादकीय: क्या शक्ति ही नीति है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर कब्जा अप्रत्याशित नहीं था, इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार की जा रही थी, लेकिन जिस तरह एक संप्रभु देश वेनेजुएला के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई करके इसे अंजाम दिया गया, वह केवल शक्ति-प्रदर्शन का नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कानून, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नैतिकता का गंभीर मामला बन गया है।
किसी भी स्थिति में एक संप्रभु राष्ट्र पर जब तक वह संयुक्त राष्ट्र चार्टर में परिभाषित आत्मरक्षा या सामूहिक सुरक्षा की शर्तों का उल्लंघन न कर रहा हो, बल प्रयोग नाजायज़ है। ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस को इस कारगुजारी के लिए विश्वास में नहीं लिया। इस तरह यह न केवल अमेरिकी लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को, जिसकी लाठी उसकी भैंस का यह संदेश देता है।
वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ लंबे समय से असंतोष रहा है और विपक्षी आंदोलनों को अमेरिकी समर्थन के आरोप भी लगते रहे, तो क्या अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक दबाव के जरिए सत्ता परिवर्तन की कोशिश नहीं कर सकता था। सैन्य कार्रवाई बताती है कि शायद धैर्य और बहुपक्षीयता की जगह त्वरित नियंत्रण और संसाधनों, खासतौर पर तेल पर कब्जे को प्राथमिकता देने में जल्दबाजी की गई।
यह स्थिति 2003 में ईराक पर हुई कार्रवाई और सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध की याद दिलाती है, जहां ‘विनाशकारी हथियारों’ के आरोप बाद में कमजोर साबित हुए। विचारधारा आधारित शत्रुता को व्यावहारिक नीति के रूप में अपनाने की कीमत अंततः क्षेत्रीय अस्थिरता, आतंकवाद और मानवीय संकट के रूप में चुकानी पड़ी। वेनेजुएला के मामले में भी यही खतरा है। सैन्य कार्रवाई के दौरान नागरिक ठिकानों को नुकसान पहुंचा और निर्दोष लोग मारे गए हैं। निःसंदेह यह अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। ‘नार्को-टेरर’ जैसे आरोपों को सिद्ध करने का दायित्व भी हमलावर पर ही होता है; केवल आरोप लगाकर किसी देश की संप्रभुता को रौंदा नहीं जा सकता। यह भी संदिग्ध है कि वेनेजुएला का राजनीतिक नेतृत्व और आम जनता ‘अमेरिकी शक्ति ही नीति है’ की सोच और उसके प्रभुत्व को सहजता से स्वीकार कर लेगी।
चिली को छोड़ कर विश्व और दक्षिण अमेरिका के अधिकांश देशों द्वारा इस कार्रवाई की आलोचना यह दिखाती है कि क्षेत्रीय राजनीति में अमेरिका के प्रति अविश्वास और बढ़ेगा। स्थानीय हिंसा और अस्थिरता का चक्र तेज़ होने की आशंका भी प्रबल है। यदि मामला अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक जाता है, तो अमेरिका पर यह आरोप भी लगेगा कि वह अपने प्रभाव से न्याय को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। यह स्थिति वैश्विक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत होगा। भारत के लिए यह प्रकरण महत्वपूर्ण सबक देता है। नई दिल्ली को स्पष्ट रूप से अंतर्राष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए। किसी भी महाशक्ति की एकतरफा सैन्य कार्रवाई का समर्थन न करते हुए, भारत को बहुपक्षीयता, संवाद और कूटनीति को ही वैश्विक शांति का आधार मानने की अपनी नीति पर दृढ़ रहना चाहिए। यही भारत के दीर्घकालिक हित और वैश्विक जिम्मेदारी दोनों के अनुरूप होगा।
