संपादकीय: 'पुनरीक्षण' का पुनरीक्षण हो
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के एसआईआर के बाद नई मसौदा मतदाता सूची ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता से अधिक उसकी समावेशिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले की प्रकाशित सूची में 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज थे, लेकिन नई ड्राफ्ट सूची में 2.89 करोड़ नामों का बाहर होना आनुपातिक रूप से असाधारण है। सबसे अधिक लगभग 19 प्रतिशत मतदाताओं का अवैध होना प्रक्रिया की परिशुद्धता पर शंका पैदा करता है। तमिलनाडु व गुजरात में लगभग 15 प्रतिशत नाम कटने की तुलना में यूपी का 19 प्रतिशत का आंकड़ा दो ही संभावनाएं दिखाता है, या तो यहां एसआईआर असाधारण सख्ती से हुआ या फिर लापरवाही से।
लखनऊ में 30 प्रतिशत से अधिक, गाजियाबाद में 29 प्रतिशत, मेरठ, गौतम बुद्ध नगर और कानपुर नगर में 25 प्रतिशत तथा बरेली में 21 प्रतिशत नाम कटना इस सवाल को तीखा करता है कि क्या पिछले चुनावों तक हर चौथा मतदाता ‘अवैध’ था, या फिर तंत्र ने बहुत से वैध मतदाताओं को ही छांट दिया। लोकतंत्र में मतदाता सूची का शुद्ध होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका समावेशी होना भी। यदि शुद्धिकरण की प्रक्रिया ही वंचना का माध्यम बन जाए, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाला कदम होगा। इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने से एसआईआर की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की कार्यकुशलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सरकार और आयोग की मंशा भले ही यह हो कि कोई वैध मतदाता न छूटे, लेकिन वर्तमान आंकड़े इस लक्ष्य से मेल नहीं खाते। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह पारदर्शिता, समयसीमा में राहत और पुनः नाम जोड़ने की सरल व्यवस्था के साथ इस प्रक्रिया पर पुनर्विचार करे, क्योंकि लोकतंत्र में एक भी वैध मत का खोना, व्यवस्था की हार होती है। सत्यापन के समय अनुपस्थित पाए गए करीब पौने तीन लाख मतदाताओं के नामों का भविष्य क्या होगा? क्या उन्हें पुनः जोड़ने की सरल, सुलभ और समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित है? राज्य की 67 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, जहां मोबाइल नेटवर्क, डिजिटल साक्षरता और दस्तावेजों की उपलब्धता सीमित है। अशिक्षितों, अकुशल मजदूरों, गरीबों से यह अपेक्षा करना कि वे काम छोड़कर फॉर्म भरें, तहसील के चक्कर लगाएं और जटिल सत्यापन प्रक्रिया पूरी करें व्यवहारिक नहीं।
ड्राफ्ट सूची में 26 लाख नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए हैं; इन्हें हटाना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक चिंताजनक है ‘सेल्फ’, ‘प्रोजेनी’ और ‘नाइदर’ की श्रेणियों का प्रयोग। काम जल्दी निपटाने के दबाव, गांवों में कमजोर नेटवर्क और लंबी फीडिंग प्रक्रिया के चलते यदि बड़ी संख्या में लोगों को बिना पर्याप्त पुष्टि के कहीं ‘नाइदर’ श्रेणी में तो नहीं डाल दिया गया, यदि ऐसा हुआ है, तो यह प्रशासनिक सुविधा को नागरिक अधिकारों पर वरीयता देने का उदाहरण होगा। देश के अन्य राज्यों में भी लाखों नाम हटाने की तैयारी है और अनुमान है कि आगामी चरणों में 12–15 करोड़ लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। इसका असर राज्य और आम चुनावों की वैधता, प्रतिनिधित्व और परिणाम, तीनों पर पड़ेगा। निर्णायक सूची बनने से पहले शायद इसका ख्याल रखा जाए।
