पोंगल : तमिल परंपरा का जीवंत उत्सव
तमिलनाडु का शस्योत्सव अथवा फसल कटाई का पर्व पोंगल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सांस्कृतिक उत्सव है। यह पर्व नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस शुभ अवसर पर सूर्य को समस्त सृष्टि के पीछे निहित जीवन-ऊर्जा के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है और इस अवधि को उत्तरायण पुण्यकालम कहा जाता है, जिसे हिंदू सौर कैलेंडर के अनुसार अत्यंत शुभ माना गया है। इस वर्ष पोंगल 15 जनवरी से 18 जनवरी तक मनाया जाएगा। लगभग दो हजार वर्ष पुराने इस त्योहार के प्रमाण चोल काल से मिलते हैं, जो इसकी प्राचीनता और सांस्कृतिक गहराई को दर्शाते हैं। पोंगल मुख्य रूप से तमिलनाडु में उगाई जाने वाली तीन प्रमुख फसलों चावल, हल्दी और गन्ना के इर्द-गिर्द केंद्रित है। ‘पोंगल’ शब्द का अर्थ है उबलना या ऊपर से बहना। यही अर्थ उस पारंपरिक व्यंजन से भी जुड़ा है, जो इस पर्व का अभिन्न अंग है। यह उबाल समृद्धि, भरपूर फसल और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
परंपरागत रूप से पोंगल शुभ मुहूर्त में घर के आंगन में पकाया जाता है। यह मुहूर्त अक्सर मंदिर के पुजारी द्वारा बताया जाता है। आज भी कई घरों में पत्थर से बने चूल्हों पर मिट्टी के बर्तनों में पोंगल पकाने की परंपरा जीवित है। लकड़ी के ईंधन पर पकाया गया पोंगल अपने विशिष्ट स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। जैसे ही पकवान उबलकर बर्तन से बाहर आने लगता है, लोग ‘पोंगालो पोंगल’ का सामूहिक उद्घोष करते हैं। इस समय एक-दूसरे से पूछा जाता है-“पाल पोंगिता?” यानी क्या दूध उबल गया है? जो शुभता का संकेत होता है। पोंगल की शुरुआत मकर संक्रांति यानी सूर्य उत्तरायण से होती है और यह चार दिनों तक विभिन्न रूपों में मनाया जाता है भोगी पोंगल, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल और कानुम पोंगल।
भोगी पोंगल
पोंगल उत्सव का पहला दिन भोगी पोंगल कहलाता है। इस दिन वर्षा और समृद्धि के देवता भगवान इंद्र की पूजा की जाती है, क्योंकि अच्छी फसल के लिए वर्षा का विशेष महत्व होता है। इसी कारण इसे इंद्रन भी कहा जाता है। इस दिन घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है और फर्श पर चावल के घोल से सुंदर कोलम बनाए जाते हैं। कोलम न केवल सजावटी होते हैं, बल्कि उस पवित्र स्थान को भी चिह्नित करते हैं, जहां पोंगल पकाया जाएगा। दिन के अंत तक खेतों से ताजी फसल चावल, हल्दी और गन्ना घर लाई जाती है। शाम को भगवान इंद्र के सम्मान में अलाव जलाए जाते हैं, जिनके चारों ओर नृत्य और गायन का आयोजन होता है।
सूर्य पोंगल / थाई पोंगल
दूसरा दिन थाई पोंगल या सूर्य पोंगल कहलाता है और इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन की शुरुआत प्रातः काल स्नान के बाद कोलम बनाने से होती है, जो प्रायः घर की महिलाएं करती हैं। परिवार के सभी सदस्य नए वस्त्र धारण करते हैं और फिर पोंगल पकाने की मुख्य रस्म आरंभ होती है। मिट्टी के बर्तन में चावल उबाले जाते हैं, जिनमें हल्दी का पौधा बांधा जाता है। बर्तन को सुंदर चित्रकारी से सजाया जाता है और आंगन में चूल्हे पर रखा जाता है। पकने के बाद पोंगल को केले, नारियल और गन्ने के साथ सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। पहले देवताओं, फिर मवेशियों और अंत में परिवार व मित्रों को पोंगल बांटा जाता है। इस क्रम का पालन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
मट्टू पोंगल
तीसरे दिन मट्टू पोंगल मनाया जाता है, जो मवेशियों को समर्पित होता है। किसान के जीवन में मवेशियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, इसलिए इस दिन उनका आभार प्रकट किया जाता है। मवेशियों को स्नान कराया जाता है, उनके सींगों को रंगा-संवारा जाता है और फूलों से सजाया जाता है। बुरी नजर से बचाने के लिए उनकी आरती की जाती है। इस दिन जल्लीकट्टू जैसे पारंपरिक पशु खेलों का भी आयोजन होता है।
कानुम पोंगल
चौथा और अंतिम दिन कानुम पोंगल उत्सव के समापन का प्रतीक है। यह आनंद और मेल-मिलाप का दिन होता है। इस दिन चावल को हल्दी के पत्तों पर रखकर पक्षियों के लिए अर्पित किया जाता है। घर की महिलाएं परिवार की समृद्धि और भाइयों की कुशलता के लिए सामूहिक प्रार्थना करती हैं। हल्दी जल से आरती कर उसे पूरे घर में छिड़का जाता है। कानुम पोंगल को नए रिश्ते तय करने, विवाह प्रस्तावों और नए सामाजिक बंधनों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस प्रकार पोंगल केवल फसल का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और सामूहिक जीवन-मूल्यों का उत्सव है, जो आज भी तमिल संस्कृति की जीवंत पहचान बना हुआ है।
