रायबरेली : नन्हे कंधों पर उम्र से बड़ी जिम्मेदारी लेकर निकला भाई... बहन भी रही साथ, एक दृश्य जिसने पत्थर दिल को भी पिघला दिया

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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रायबरेली, अमृत विचार। मासूम भाई-बहन जिनकी उम्र महज 7 और 6 साल है। इतनी कम उम्र में भाई ने बहन को साइकिल पर बैठाकर एक दो नहीं बल्कि करीब 30 किमी की दूरी हाईवे पर तय कर डाली। रविवार को इन दोनों भाई-बहनों के गुमशुदा होने और फिर उनके मिलने की खबर ने हर किसी को आश्चर्य में डाल दिया।

इस दौरान नज़ारा ऐसा था कि कुछ क्षणों के लिए समय जैसे रुक गया हो। नन्हे कंधों पर उम्र से बड़ा सफर, मासूम आंखों में अनजाना भरोसा और बछरावां थाने में साइकिल के साथ खड़े दो छोटे से साये- यह दृश्य पत्थर दिल को भी पिघला देने वाला था। लोग कुछ देर तक उन्हें देखते रहे, कोई सोच में डूब गया, तो किसी की आंखें भर आईं।

मिल एरिया थाना क्षेत्र के मलिकमऊ कॉलोनी में रामसुमिरन अपने परिवार के साथ रहता है। उसके दो बच्चे सात वर्षीय निखिल और छह वर्षीय नित्या घर के बाहर ही खेल रहे थे। खेल-खेल में साइकिल चलाते हुए दोनों मासूम हाईवे पर पहुंच गए और लापता हो गए। उधर, काफी देर तक बच्चों के मोहल्ले में नहीं दिखाई देने पर मां ने खोज शुरू की, लेकिन उनका कहीं पता नहीं चला। इसके बाद तो मानों पूरी दुनिया ही उजड़ गई हो। 

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कुछ ही पलों के लिए आंखों से ओझल हुए बच्चे जब नजर नहीं आए, तो मां की चीख दिल चीर देने वाली थी। आंगन में गूंजता करुण क्रंदन सुनकर पड़ोसी दौड़े चले आए। मां बेसुध होकर कभी दरवाजे की ओर देखती, कभी गली की तरफ भागती और बार-बार अपने बच्चों का नाम पुकारती। हर सांस के साथ उसकी उम्मीद टूटती और हर आंसू में एक ही सवाल था-मेरे बच्चे कहां हैं?

रोती मां को देख पूरा मोहल्ला सहम गया। किसी ने पानी दिया, किसी ने उसे संभालने की कोशिश की, तो किसी ने बिना देर किए थाने में सूचना दी। खबर मिलते ही पुलिस हरकत में आई। मासूम भाई-बहन की तलाश एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसानियत की पुकार बन गई। पुलिस ने हर संभावित रास्ते की जानकारी जुटाई और तलाश शुरू कर दी। 

इधर, बछरावां थाना क्षेत्र के पहरावां में पंचर साइकिल के साथ खड़े बच्चों से जब लोगों ने पूछा कि वे कहां जा रहे हैं, तो उनका जवाब सुनकर हर कोई हतप्रभ रह गया। मासूमियत से उन्होंने कहा-“हम गांव जा रहे हैं।” न डर, न घबराहट, बस एक सीधी-सी बात। उनकी भोली जिद और अनजान हिम्मत को देखकर लोगों का दिल भर आया। किसी ने उन्हें पानी पिलाया, किसी ने छांव में बैठाया, तो किसी ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।

बछरावां पुलिस ने जिस संवेदनशीलता और तत्परता से इन बच्चों को अपने संरक्षण में लिया, वह सराहनीय रही। बच्चों से प्यार से बात की गई, उन्हें सुरक्षित माहौल दिया गया और हर कदम पर यह ध्यान रखा गया कि वे डरे नहीं। फिर उन्हें मिल एरिया थाने लाकर परिजनों के सुपुर्द किया गया। यह खबर जैसे ही शहर पहुंची, मायूस दिलों में उम्मीद की किरण दौड़ गई।

थाने में जैसे ही मां की नजर अपने बच्चों पर पड़ी, वह खुद को रोक नहीं सकी। बर्बस फफक कर रो पड़ी और दोनों बच्चों को सीने से भींच लिया। उस पल मां की सिसकियों में डर नहीं, राहत थी; आंसुओं में दर्द नहीं, शुक्रिया था। वह बार-बार बच्चों का माथा चूमती रही, मानो हर चुंबन से उस भयावह समय को मिटा देना चाहती हो। वहां मौजूद पुलिसकर्मियों और लोगों की आंखें भी नम हो गईं।

मां ने कांपती आवाज में पुलिस का आभार जताया। उसने कहा कि आज पुलिस ने सिर्फ उसके बच्चे ही नहीं, उसकी पूरी दुनिया लौटा दी है। समय पर की गई कार्रवाई और मानवीय व्यवहार ने यह साबित कर दिया कि वर्दी के भीतर भी एक संवेदनशील दिल धड़कता है।

यह घटना केवल दो बच्चों के भटकने की कहानी नहीं, बल्कि मां की ममता, समाज की संवेदनशीलता और पुलिस की जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बन गई। पंचर साइकिल से शुरू हुई यह कहानी आंसुओं, दुआओं और राहत की मुस्कान पर आकर थमी। पूरे शहर ने राहत की सांस ली और यह एहसास और गहरा हो गया कि जब इंसानियत साथ खड़ी होती है, तो हर खोया हुआ रास्ता अपने आप मिल जाता है।

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