मृत्यु को चुनौती देने की मानवीय महत्वाकांक्षा और उसके वैज्ञानिक, नैतिक आयाम
मनुष्य ने सदियों से मृत्यु को अपनी सबसे बड़ी पराजय माना है। प्राचीन सभ्यताओं में अमृत की खोज, चीन के सम्राटों द्वारा जीवन रसायनों की तलाश और भारतीय पौराणिक कथाओं में अमृत मंथन की कहानियां इस बात की गवाह हैं कि अमरता मानव की सबसे पुरानी आकांक्षाओं में से एक रही है। 21वीं सदी में यह खोज पौराणिक कथाओं से निकलकर अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं तक पहुंच चुकी है, जहां अरबों डॉलर की पूंजी और विश्व के श्रेष्ठ वैज्ञानिक इस प्रश्न से जूझ रहे हैं, क्या मनुष्य वास्तव में मृत्यु के विधान को बदल सकता है?—जयदेव राठी भरण, स्वतंत्र लेखक
विज्ञान की नई सीमाएं: कहां पहुंची है अमरत्व की खोज
आज एंटी-एजिंग और दीर्घायु अनुसंधान एक बहु-अरब डॉलर का उद्योग बन चुका है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, वैश्विक एंटी-एजिंग बाजार 2023 में 60 से 70 अरब डॉलर का था, जो 2030 तक 100 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। सिलिकॉन वैली के अरबपति इस दौड़ में सबसे आगे हैं। जेफ बेजोस द्वारा समर्थित एल्टोस लैब्स सेलुलर रीप्रोग्रामिंग पर काम कर रही है, जबकि गूगल की सहायक कंपनी कैलिको उम्र बढ़ने की जैविक प्रक्रिया को समझने में अरबों डॉलर खर्चकर रही है।
सैम ऑल्टमैन और ब्रायन जॉनसन जैसे तकनीकी उद्यमी स्वयं को “जीवित प्रयोगशाला” में बदल चुके हैं। ब्रायन जॉनसन अपने “ब्लूप्रिंट” कार्यक्रम पर हर साल लाखों डॉलर खर्च करते हैं और दावा करते हैं कि उनकी जैविक आयु वास्तविक आयु से कई वर्ष कम हो चुकी है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चार प्रमुख मार्ग
वैज्ञानिक दृष्टि से अमरता या दीर्घायु की खोज चार प्रमुख दिशाओं में आगे बढ़ रही है। पहली, सेनोलिटिक्स, जिसमें शरीर से बूढ़ी और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाने का प्रयास किया जाता है। चूहों पर इसके सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन मनुष्यों पर व्यापक परीक्षण अभी जारी हैं।
दूसरी दिशा टेलोमियर विस्तारण की है। टेलोमियर हमारे गुणसूत्रों के सिरे होते हैं, जो हर कोशिका विभाजन के साथ छोटे होते जाते हैं। इन्हें लंबा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, हालांकि इससे कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
तीसरी दिशा नैनोटेक्नोलॉजी और आणविक मरम्मत की है, जहां भविष्य में नैनो-रोबोट्स द्वारा कोशिकाओं की मरम्मत की कल्पना की जा रही है।
चौथी और सबसे विवादास्पद दिशा क्रायोनिक्स और माइंड अपलोडिंग की है, जिसमें मृत्यु के बाद शरीर या मस्तिष्क को अत्यंत निम्न तापमान पर संरक्षित किया जाता है, इस उम्मीद में कि भविष्य की तकनीक उन्हें पुनर्जीवित कर सकेगी।
व्यक्तिगत उपचार योजनाएं
इन तमाम प्रयासों के बावजूद वास्तविकता अपेक्षाकृत संयमित है। पिछले सौ वर्षों में वैश्विक औसत जीवन प्रत्याशा 30 से बढ़कर लगभग 73 वर्ष हुई है, लेकिन यह वृद्धि मुख्यतः बेहतर स्वच्छता, पोषण और चिकित्सा सुविधाओं के कारण है, न कि उम्र बढ़ने की मूल जैविक प्रक्रिया पर विजय के कारण। आज तक प्रमाणित अधिकतम मानव आयु 122 वर्ष ही है और पिछले दशकों में इस सीमा में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। मेटफॉर्मिन, रैपामाइसिन और एनएडी प्लस जैसी दवाओं ने प्रयोगशाला में जानवरों की आयु बढ़ाई है, लेकिन मनुष्यों पर उनके दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं हैं। अधिकांश वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि हम “स्वस्थ जीवनकाल” बढ़ा सकते हैं, पूर्ण अमरता अभी विज्ञान कथा ही है।
इस खोज को गति देने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका निर्णायक बनती जा रही है। एआई दवा खोज की प्रक्रिया को तेज कर रहा है, जैविक बायोमार्कर्स की पहचान में मदद कर रहा है और व्यक्तिगत उपचार योजनाएं तैयार कर रहा है।
एआई आधारित एल्गोरिदम अब किसी व्यक्ति की जैविक आयु का आकलन पहले से कहीं अधिक सटीकता से कर पा रहे हैं, लेकिन यह खोज गंभीर नैतिक और सामाजिक प्रश्न भी खड़े करती है। यदि दीर्घायु तकनीकें सफल होती हैं, तो क्या वे केवल अमीरों तक सीमित रहेंगी? क्या समाज में एक नया जैविक वर्गभेद पैदा होगा? जनसंख्या, संसाधन और पीढ़ियों के बीच अवसरों का संतुलन भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: परंपरा और आधुनिकता का संगम
भारतीय दर्शन मृत्यु को जीवन के स्वाभाविक चक्र का हिस्सा मानता है। गीता का कथन- “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः” इसी सत्य को रेखांकित करता है। यहां अमरता आत्मा के स्तर पर मानी गई है, शरीर के स्तर पर नहीं। आयुर्वेद ने दीर्घ और स्वस्थ जीवन पर जोर दिया, लेकिन शाश्वत शारीरिक अमरता को लक्ष्य नहीं बनाया।
आशा और यथार्थ के बीच
विज्ञान हमें अधिक स्वस्थ और लंबा जीवन दे सकता है, लेकिन मृत्यु को पूरी तरह परास्त करना अभी दूर की बात है। शायद असली प्रश्न यह नहीं है कि क्या हम अमर हो सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या हमें अमर होना चाहिए। 120 वर्षों का रोगग्रस्त जीवन, 80 वर्षों के स्वस्थ, सार्थक और संतुलित जीवन से बेहतर नहीं कहा जा सकता। वास्तविक बुद्धिमत्ता शायद सीमाओं को पूरी तरह तोड़ने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि हमें कहां रुकना चाहिए।
