Uttrakhand: बेटियों को मायके की याद दिला रही घुघती की “कू…कू”
पवन कुंवर, हल्द्वानी। पहाड़ों पर जहां चैत्र के महीनों प्रकृति घुघुती पक्षी की चहक और नए फूलों से हरीभरी हो रही है वहीं, तमाम परिवारों में रिश्तों की भावुकता भी हिलोरे मार रही है। रविवार से प्रेम और भावनात्मक रिश्ते की इसी ऐतिहासिक गढ़वाली, कुमाऊंनी परंपरा को हम देख सकेंगे। पहाड़ में इसे भिटौली की परंपरा के रूप में जाना जाता है।
दरअसल, पहाड़ी क्षेत्रों की संस्कृति में शादी के बाद भी बेटी का अपने मायके से जुड़ाव उतना ही गहरा बना रहता है जितना बचपन में था। ससुराल चाहे कितनी भी दूर क्यों न हो, बेटियां अपने माता-पिता और भाई के आने का इंतजार बड़े स्नेह के साथ करती हैं।
आज भले ही परिवहन और संचार के साधन बढ़ गए हों, लेकिन एक समय पहाड़ों में रास्ते बेहद कठिन हुआ करते थे। उस दौर में शादीशुदा बेटियों का मायके आना-जाना आसान नहीं था। ऐसे में माता-पिता अपनी बेटी से मिलने के लिए उसके ससुराल खास पकवान और उपहार लेकर जाते थे।
भिटौली का अर्थ ही भेंट या मुलाकात से जुड़ा है, जो रिश्तों में दूरी को कम करने का माध्यम बनती है। भिटौली की परंपरा में मायके की ओर से बेटी के लिए स्नेह भरे उपहार भेजे जाते हैं। इनमें पारंपरिक पहाड़ी पकवान जैसे खजूर, अरसे, पूरी और अन्य स्थानीय व्यंजन शामिल होते हैं।
इसके साथ ही बेटी के लिए नए कपड़े और श्रृंगार का सामान भी दिया जाता है। जब पिता या भाई ये उपहार लेकर बेटी के घर पहुंचते हैं तो वह पल परिवार के लिए बेहद भावुक और खुशी से भरा होता है। पहाड़ों में यह भी मान्यता है कि चैत्र का महीना बेटियों के मन में मायके की यादें ताजा कर देता है।
याद आ जैछे मैके मैते की...
इसी दौरान घुघुती पक्षी की आवाज सुनकर बेटियों के मन में मायके जाने की चाह और बढ़ जाती है। इस भावना को एक प्रसिद्ध पहाड़ी लोकगीत है, ना बासा घुघुती चैत की, याद आ जैछे मैके मैते की। सदियों पहले कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए शुरू हुई यह परंपरा आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है। समय के साथ जीवनशैली बदली है और लोग शहरों में बस गए हैं, लेकिन चैत्र के महीने में मायका पक्ष अपनी बेटी या बहन को भिटौली देना आज भी उतनी ही श्रद्धा और प्रेम से निभाता है।
आज भी कुमाऊं में भिटौली की परंपरा
हल्द्वानी: वर्तमान में परिवहन और संचार के साधन पहले से काफी बेहतर हो चुके हैं, फिर भी कुमाऊं क्षेत्र में भिटौली की परंपरा आज भी जीवित है। चैत्र महीने में मायके वाले अपनी बेटी या बहन के लिए विशेष पकवान जैसे अरसे, खजूर, पूरी और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाकर भेजते हैं। इसके साथ नए कपड़े और श्रृंगार का सामान भी दिया जाता है। कई परिवार आज भी पिता या भाई को खुद बेटी के घर भिटौली लेकर भेजते हैं, जिससे परिवार के रिश्तों में अपनापन और मजबूत होता है। भले ही लोग अब शहरों में बस गए हों, लेकिन यह परंपरा आज भी कुमाऊं की संस्कृति और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक बनी हुई है।
