गजलों से पहचान हमीद खिजर
चार दशक पहले हमीद खिजर को लगा शेर-ओ-शायरी का चस्का, आज जुनून की सूरत अख्तियार कर चुका है। पांच गजल संग्रहों के शायर हमीद खिजर ने अपने जुदा तेवरों वाली शायरी से अलग पहचान बनाई है। अब हमीद का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह अपनी शायराना सलाहियतों के दम पर धीरे-धीरे मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्हें राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर मिर्जा गालिब अवार्ड और अकबर इलाहाबादी अवार्ड मिल चुके हैं।
शाहजहांपुर के मोहल्ला दिलाजाक में सितंबर 1974 में जन्मे हमीद खां हमीद खिजर को शायरी विरासत में नहीं मिली। गुनगुनाने के शौक ने धीरे-धीरे हमीद को गजल तक पहुंचा दिया। उन्होंने कम उम्र में ही बाकायदा गजल लिखना शुरू किया था। उनका मार्गदर्शन पड़ोस में रहने वाले कहानी लेखक व शायर अयूब ‘असर’ ने किया। उन्होंने हमीद की बेतरतीब शायरी को राह दिखाई। हमीद ने अपनी जादुई आवाज से जब शायरी गुनगुनाई तो सभी उनके मुरीद होते चले गए।
हमीद ने अपनी अधूरी गजलों में नौ बरस तक अयूब असर से सही कराईं। बाद में उन्हीं की सलाह पर उस्ताद शायर ‘सागर’ वारसी से जुड़ गए। नए मार्गदर्शक ने उन्हें शायरी की नोक-पलक दुरुस्त करना सिखाया। इससे हमीद ‘खिजर’ की गजलों में नयापन आया। अपनी जादुई आवाज और खूबसूरत कलाम से हमीद शहर में होने वाली महफिलों में छा गए। उन्होंने अपना दिलो-दिमाग शायरी में इस कदर लगाया कि उनके पास गजलों के ढेर लग गए।
हमीद ने इन बिखरी गजलों को संकलन के रूप में छपवाने में काफी मेहनत की। उनका पहला उर्दू गजल संग्रह ‘लम्स-ए-शबनम’ 2002 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह को खूब सराहना मिली। इसके बाद हमीद ने अपने प्रशंसकों के लिए वर्ष 2002 में हिन्दी गजल संग्रह ‘धड़कन’ के नाम से निकाला। ‘धड़कन’ के जरिए हमीद ने अपने और जमाने के सुख-दुख का एहसास कराया है।
हमीद का तीसरा गजल संग्रह उर्दू में ‘लरजते साये’ वर्ष 2015 में, चौथा हिन्दी गजल संग्रह ‘ठंडी हवा के झोंके’ 2016 में और पांचवा गजल संग्रह ‘कर्बे शबनम’ वर्ष 2020 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने एक संग्रह ‘भोर की लालिमा’ 2022 में प्रकाशित कराया, जिसमें बाबा साहेब डा.भीमराव अम्बेडकर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कई रचनाकारों के लेख शामिल हैं।
लोक निर्माण विभाग शाहजहांपुर में कार्यरत हमीद को शायरी की भूख है। वह चाहे कितने भी मायूस क्यों न हों, लेकिन मुश्किलों को भी झेलने का कलेजा रखकर हमीद, ‘गजल’ का खाका तैयार कर ही लेते हैं। हमीद ने गजल को कई रंग व ढंग देने में ‘उस्तादाना’ फन दिखाया है। हालांकि वह खुद इसे नहीं मानते। पाठकों के बीच उनकी शायरी पसंद की जाए, बस इसी को हमीद अपने लिए सबसे बड़ा इनाम मानते हैं। उनका कहना है कि शायरी ने उन्हें जीने की राह दिखाई है, इसे वह हमेशा लिखते रहेंगे।
हमीद को हिन्दी-उर्दू साहित्य सेवा के लिए उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की ओर से दो बार पुरस्कार भी मिले। उन्हें मिर्जा गालिब अवार्ड और अकबर इलाहाबादी अवार्ड से नवाजा गया। पुरस्कार मिलने से हमीद के हौसलों को नई उड़ान और नया आकाश मिला।
-राशिद हुसैन जुगनू, शाहजहांपुर
