लधुकथा : गंगा आरती में मोबाइल vs मन की लड़ाई: वृद्धा की बात ने बदल दी रिया की आस्था

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
On

लखनऊः रिया जल्दी-जल्दी दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़ रही थी। आज उसे देर हो गई थी। गंगा आरती का समय हुआ जा रहा था। वह तो रोज की तरह समय से ही निकल रही थी मगर आज उसकी पांच वर्षीय छोटी बेटी मिनी ने एन मौके पर फरमान जारी कर दिया कि उसके लिए आलू की सब्जी बनाई जाए, लौकी की सब्जी वह नहीं खाएगी। अब उसको गुस्सा तो बहुत आया कि उसे देर हो जाएगी मगर बच्ची का मन पूरा न करती तो कौन सा उसको सुकून मिलता, तब तो आरती में भी उसका मन न लगता। उसने मिनी को सब्जी बनाकर दी, फिर वह चैन से गंगा आरती के लिए चली।

दो साल से जब से रिया के पति का तबादला वाराणसी हुआ है, तब से गंगा आरती में शामिल होना जैसे उसका नियम सा हो गया है। उसे इतना सुकून मिलता है यहां मानो पूरे दिन की थकान निकल जाती है उसकी और वह फिर से रिचार्ज हो जाती है। एक नई सुबह के लिए, अंतस के सारे संताप मिट जाते हैं। इतना स्वर्गीय अनुभव है यहां की आरती का। धूप, कपूर से सारा वातावरण महक जाता है, उसकी सुगंधित वायु कैसे उसकी सांसों को तरो ताजा कर देती है। एक साथ 11 सेवादारों का शंख फूंकना मानो पूरा वातावरण ओम की ध्वनि से गुंजायमान हो गया हो और उसे शंखनाद से तो मानो उसके मस्तिष्क के सारे तनाव ही मिट जाते हों।

फिर धूप धुएं से आरती ऐसा लगता है मानो पूरा वातावरण में बादल मंडरा रहे हो। यह दृश्य कितना अद्भुत होता है। मंत्रो का उच्चारण और फिर बाद में मां गंगा के लिए भजनों द्वारा मां का गुणगान सब कुछ कितना सुखद व आत्मा को तृप्त करने वाला एहसास होता है।

आज उसे देर हो गई है, सारी जगह तो घिर ही चुकी होगी। पीछे सीढ़ियों पर भी उसे बैठने की जगह मिलेगी या नहीं। यही सोचकर वह व्यथित हो रही थी। वह घाट पर पहुंचती है कि शंखनाद शुरू हो गया था। निर्धारित पुजारी आरती के लिए अपने-अपने उच्च आसनों पर खड़े हो गए थे। आरती के दर्शन के लिए सैकड़ों लोग एकत्रित हो गए थे। पैर रखने के लिए तिल भर जगह न थी। सभी गंगा आरती के अद्भुत दृश्य को देखने के लिए आतुर थे। रिया भी सीढ़ियों पर ही टिक गई। तभी एक लगभग 70-75 वर्षीय बुजुर्ग महिला उसके पास आकर बैठने लगी। उसने उनको देखकर कहा, “अरे माताजी, आप आगे बैठिए न, यहां से तो कुछ भी नहीं दिखेगा। किसी से कह दीजिए, आपकी उम्र का लिहाज करके आपको जगह दे देंगे।कुछ लोग उन्हें देखकर उठने भी लगे। वह वृद्धा बोली, “अरे बेटा! आगे पीछे बैठना तो सब मन का वहम है। गंगा आरती को तो मन में महसूस किया जाता है। मन में श्रद्धा हो तो इस पूरे देवीय वातावरण में ही गंगा मां का आशीर्वाद बरस रहा है। वाराणसी की पावन भूमि तो साक्षात स्वर्ग ही है। यह तो फोटो और सेल्फी लेने वालों की होड़ हो गई है कि आगे से अच्छी फोटो आएगी और सबको दिखाएंगे। इन्होंने तो गंगा आरती जैसे पवन कार्यक्रम को भी दिखावे की वस्तु बना दिया है अगर आगे पीछे वाले सभी लोग शांति से बैठकर आंखें मूंदकर महसूस करें तो एक-एक पल आनंदित हो जाए।

रिया ने इधर-उधर नजरें तो दौड़ाई तो पाया सचमुच हर कोई मोबाइल ऊंचे करके वीडियो फोटो लेने में ही व्यस्त था। वृद्धा की बातों से प्रेरित होकर रिया ने भी आंखें मूंदकर ध्यान लगाया, तो उसे ऐसा एहसास हुआ मानो वह गंगा मैया की गोद में ही बैठी है और गंगा की सैर कर रही है और मां का आशीर्वाद उस पर बरस रहा है। ऐसा अद्वितीय अनुभव तो उसे आज ही हुआ था। अब उसने भी गंगा मैया की आरती को बाहरी आंखों से नहीं अपितु मन की आंखों से देखना शुरू कर दिया और उसे अलौकिक आनंद प्राप्त होने लगा।

संबंधित समाचार