रामवाटिका : जहां तुलसी की वाणी में उतरा था बालराम का सौंदर्य
मौजूद है सुंदरकांड की पांडुलिपि
दुलही गांव में रामचरित मानस के सुंदरकांड की पांडुलिपि जागेश्वर दयाल तिवारी के परिवार में सुरक्षित है। बताया जाता है कि अटकोहना निवासी पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को तुलसीदास ने पांडुलिपि उपहार में दी थी। उनके न रहने के बाद उत्तराधिकारी उदय शंकर तिवारी को मिली। कुछ समय बाद वह अटकोहना छोड़कर दुलही में आ बसे। उनके परिवार में सुंदरकांड की यह दुर्लभ पांडुलिपि बतौर विरासत सदियों से चली आ रही है। बताते हैं कि पांडुलिपि भोजपत्र पर काली स्याही से मोटे अक्षरों में लिखी है। हर पन्ने पर सीता राम लिखी गोल मुहर लगी हुई है। पांडुलिपि पर संवत 1672 अंकित है। बताते हैं कि गोरखपुर गीता प्रेस संचालक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने जिले में आकर पांडुलिपि के तुलसीदास की हस्तलिखित होने की पुष्टि की थी। उन्होंने कल्याण के वर्ष 13, अंक तीन मानसांक खंड तीन में इस पांडुलिपि का जिक्र करते हुए इसे मौलिक और प्रामाणिक बताया था।
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रामवाटिका पहुंचते ही लगता है मानो समय ठहर गया हो और सदियों पुरानी तपस्या की गूंज अब भी वृक्षों की छांव में सुनाई देती हो। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार लगभग 470 वर्ष पूर्व संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने इस स्थान पर चातुर्मास व्यतीत किया था। इसी दौरान उन्होंने प्रभु श्रीराम के बाल स्वरूप की दिव्य लीलाओं को शब्दों में पिरोते हुए बालकांड के अंशों की रचना की। कहा जाता है कि साधना के उन्हीं दिनों में तुलसीदास ने यहां अपनी दातून भूमि में गाड़ दी थी। समय बीतता गया और वह दातून आज एक विशाल वटवृक्ष के रूप में खड़ी है। उसकी फैली शाखाएं और गहरी जड़ें मानो बीते युगों की साक्षी बनकर आज भी इतिहास सुनाती हैं। रामवाटिका की हवा में लोकविश्वास और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर और श्रीराम दरबार मंदिर को लेकर भी लोगों की गहरी आस्था है।
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रामवाटिका केवल इतिहास या किंवदंतियों का स्थल नहीं, बल्कि वह भावभूमि है, जहां साहित्य और भक्ति एकाकार हो जाते हैं। यहां आने वाला हर व्यक्ति प्रकृति की नीरवता में तुलसी की चौपाइयों की अनुगूंज महसूस करता है। वटवृक्ष की छांव, मंदिरों की घंटियां और सरयू अंचल की स्मृतियां मिलकर ऐसा वातावरण रचती हैं, जो मन को सहज ही आध्यात्मिक शांति से भर देता है। हर वर्ष होली के अवसर पर यहां लगने वाला मेला इस स्थान की जीवंत परंपरा को आज भी संजोए हुए है। दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं। कोई तुलसी की तपोभूमि के दर्शन करने आता है, तो कोई उस वटवृक्ष के नीचे खड़े होकर इतिहास को महसूस करना चाहता है, जिसने सदियों का सफर तय किया है। तेजी से बदलते समय में रामवाटिका जैसी धरोहरें केवल धार्मिक महत्व नहीं रखतीं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, लोकविश्वास और साहित्यिक विरासत की अमूल्य निधि हैं। यह वह स्थान है, जहां तुलसी की भक्ति, प्रकृति की नीरवता और लोकआस्था मिलकर एक ऐसा अध्याय रचती हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने की प्रेरणा देता रहेगा।
तुलसीदास के ठहरने के हैं प्रमाण
धौरहरा के वाजिबुलअर्ज में जांगड़ा राजा खड़ग सिंह का एक आलेख मिलता है, जिसमें लिखा है कि फकीर बैरागी तुलसीदास सरजू किनारे भ्रमण करते हुए जंगल में आए। उन्होंने यहां रामचरित मानस के कुछ अंश रचे। तुलसीदास की रचना स्थली रामबटी धौरहरा में ठाकुरद्वारा के रूप में आज भी मौजूद है। यहां एक मंदिर में तुलसीदास द्वारा स्थापित राम, लक्ष्मण और सीता की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं।
धौरहरा रियासत के जांगड़ा राजा जोत सिंह को तुलसीदास के आगमन का समाचार मिला, तो वे उनसे मिलने रामवाटिका पहुंचे। उस समय संत तुलसीदास सरयू स्नान के लिए गए हुए थे। प्रतीक्षा करते हुए राजा उनके आसन पर बैठ गए। जब तुलसीदास लौटे और अपने आसन पर राजा को बैठे देखा, तो वे अप्रसन्न हो उठे और राजा को शाप दे दिया। लोककथाएं कहती हैं कि उसी समय उन्होंने अपनी दातून भूमि में रोप दी थी, जो आज विशाल वटवृक्ष के रूप में श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है। श्रीराम वाटिका गोस्वामी तुलसीदास की रचनास्थली रही है। यहीं पर प्रवास करते हुए गोस्वामी जी ने भगवान राम के बाल रूप की बालकांड के रूप में रचना की थी। इसकी पुष्टि दुलही गांव में रखी, उनकी पांडुलिपि प्रति के साथ गीता प्रेस के लोग भी कर चुके हैं।
-विद्यासागर, पुजारी हनुमान मंदिर, श्रीराम वाटिका धाम
