भगवान शांतिनाथ के अद्वितीय संदेश प्रकाश स्तंभ
जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ जी का जीवन मानवता के लिए शांति, करुणा और आत्मसंयम का अद्वितीय संदेश देता है। उनका नाम ही शांतिनाथ इस बात का प्रतीक है, उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से संसार को आंतरिक शांति का मार्ग दिखाया। जैन धर्म के अनुसार श्री शांतिनाथ भगवान सोलहवें तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती के साथ-साथ कामदेव पद के भी धारक थे।
भगवान शांतिनाथ का जीव जब सर्वार्थ सिद्धि से माता एरा देवी के गर्भ में आया, तो स्वर्ग के देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। नौ महीने व्यतीत हो जाने के बाद हस्तिनापुर के राजा श्री विश्व सेन और रानी श्रीमती एरा देवी के घर ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन प्रातः काल में तीन लोक के नाथ ने जन्म लिया। भगवान शांतिनाथ जी का जन्म हस्तिनापुर में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। देवों ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक महोत्सव मनाया और उनका नाम शांतिनाथ रखा।
शांतिनाथ भगवान की आयु एक लाख वर्ष की थी, शरीर 40 धनुष ऊंचा था और बदन स्वर्ण के समान था और उनका चिन्ह हिरण है। उनके पिता महाराज विश्वसेन एक प्रतापी और न्यायप्रिय शासक थे, जबकि माता एरा देवी अत्यंत धर्मनिष्ठ और आदर्श नारी थीं। भगवान की यौवन अवस्था आने पर उनके पिता ने अनेक कन्याओं के साथ उनका विवाह कर दिया। इस तरह भगवान के कुमार काल के पच्चीस हजार वर्ष व्यतीत हो गए तब महाराज विश्व सेन ने अपना राज्य सौंपकर भोगों से विरक्ति ले ली। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गए, तब उनकी आयुधशाला में चक्रवर्ती के वैभव को प्रकट करने वाला चक्र रत्न उत्पन्न हो गया। चक्र रत्न आदि को लेकर भगवान दिग्विजय के लिए निकल गए और विधिवत्त दिग्विजय करके इस भरत क्षेत्र में एक छत्र शासन किया।
चक्रवर्ती की छियानवे हजार रानियां थीं और चक्रवर्ती के वैभव से परिपूर्ण थीं। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष साम्राज्य पद में व्यतीत हो गए,तब एक समय स्वयं को दर्पण में देखते हुए, उन्हें अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो गया, तब भगवान शरीर संसार और भोगों के स्वरूप का विचार करते हुए विरक्त हो गए। शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हुआ, भौतिक सुख क्षणिक हैं और वास्तविक आनंद आत्मा की शुद्धि में है। इस अनुभूति ने उन्हें संसार के मोह-माया से दूर होकर दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कठोर ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति की। वैराग्य होने पर लौकांतिक देवों ने आकर उनकी पूजा स्तुति की और उस समय इंद्र भी उपस्थित हो गए।
भगवान ने अपने नारायण नामक पुत्र का राज्याभिषेक करके राज्य सौंप दिया। इंद्र ने दीक्षाभिषेक करके सरवर सिद्धि नाम की पालकी में विराजमान कर मनुष्य और देव हस्तिनापुर के बाहर वन में ले गए। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को नियम लेकर भगवान ने पंचमुखी केश लोच करके नम: सिद्ध कहते हुए जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और संपूर्ण परिग्रह का त्याग करके ध्यान में स्थिर हो गए। भगवान को तीन ज्ञान तो जन्म से ही थे, दीक्षा ग्रहण करते ही चौथ ज्ञान मनः पर्यय भी प्राप्त हो गया। दीर्घकालीन तपस्या के पश्चात उन्हें केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई। फिर पौष शुक्ल दशमी के दिन 13 वें गुणस्थान में पहुंचकर केवल ज्ञान से विभूषित हो गए। तुरंत ही इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने समोसरण की रचना कर दी। भगवान के समोसरण में छत्तीस गणधर थे।
इस प्रकार भगवान ने बहुत काल तक समस्त जीवों के कल्याण के लिए धर्मोपदेश देना प्रारंभ किया। उन्होंने स्पष्ट किया, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना क्रोध, लोभ और अहंकार है। इन पर विजय प्राप्त कर ही व्यक्ति सच्ची शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। जब भगवान की आयु एक माह शेष रह गई तब सम्मेद शिखर आए और अपनी साधना पूर्ण की और चारों अघातिया कर्मों का नाश करके ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन लोक के अग्रभाग पर जाकर विराजमान हो गए यानी मोक्ष को प्राप्त किया। उत्तर पुराण में कहते हैं, संसार में श्री शांतिनाथ जिनेंद्र को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों में ऐसा कौन है, जिसने पूर्व प्रत्येक भव में बहुत भारी धर्म वृद्धि प्राप्त की हो अर्थात कोई नहीं, इसीलिए सबका भला करने वाले श्री शांतिनाथ भगवान का निरंतर ध्यान करना सभी को सदैव शांति एवं शक्ति प्रदान करता है।
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