संपादकीय: मतभेद का मतलब

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Published By Monis Khan
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ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक वास्तविकताओं और अमेरिका-इजराइल संबंधों के भीतर बढ़ती वैचारिक दूरी बताता है। साफ है कि अमेरिका अब इजराइल की हर सैन्य प्राथमिकता को बिना शर्त स्वीकार नहीं करने वाला। यह मतभेद ईरान के लिए रणनीतिक अवसर देता है। तेहरान को लगता है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच पूर्ण सामंजस्य नहीं है, तो वह वार्ता में अधिक कठोर रुख अपनाएगा। 

लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि ट्रंप और नेतन्याहू लगभग समान सोच वाले हैं— दोनों कठोर राष्ट्रवाद, सैन्य शक्ति और ईरान-विरोध की राजनीति के प्रतीक रहे, किंतु युद्ध और कूटनीति के वास्तविक क्षण अक्सर मित्रताओं की सीमाएं उजागर कर देते हैं। तनाव का बड़ा कारण लक्ष्य और प्राथमिकताओं का अंतर है। इजराइल के लिए ईरान एक प्रत्यक्ष, भौगोलिक और अस्तित्वगत खतरा है। 

तेहरान समर्थित समूह हिजबुल्लाह, हमास और अन्य क्षेत्रीय नेटवर्क इजराइल की सुरक्षा रणनीति के केंद्र में हैं। नेतन्याहू मानते हैं कि यदि ईरान को अभी निर्णायक रूप से नहीं रोका गया, तो वह अपनी मिसाइल, ड्रोन और परमाणु क्षमता को इतना मजबूत कर लेगा कि भविष्य में उसे नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाएगा, इसलिए इजराइल युद्ध को ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘पूर्व-निवारक आवश्यकता’ के रूप में देखता है। इसके विपरीत अमेरिका की प्राथमिकताएं कहीं अधिक व्यापक और जटिल हैं। ट्रंप लंबे, महंगे और अनिश्चित युद्धों से बचना चाहते हैं। इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों ने अमेरिकी समाज को युद्ध से थका दिया है। 

अमेरिकी जनता पश्चिम एशिया में एक और व्यापक सैन्य हस्तक्षेप के पक्ष में दिखाई नहीं देती। ट्रंप यह भी समझते हैं कि पूर्ण युद्ध तेल बाजार, वैश्विक व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दे सकता है, इसलिए वे सैन्य दबाव बनाए रखते हुए भी अंतिम क्षण तक समझौते और शक्ति-प्रदर्शन के मिश्रण की नीति अपनाना चाहते हैं। यही कारण है कि युद्ध के शुरुआती दौर से ही ट्रंप और नेतन्याहू के दृष्टिकोण में अंतर दिखाई देता रहा। इजराइल त्वरित और निर्णायक सैन्य कार्रवाई चाहता रहा, जबकि अमेरिका कई बार संयम, वार्ता और ‘नियंत्रित दबाव’ की रणनीति की ओर झुकता दिखा।

ट्रंप की राजनीतिक मजबूरियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। वे एक ओर अमेरिकी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते हैं, दूसरी ओर युद्ध-विरोधी घरेलू भावना को भी नाराज नहीं कर सकते। यदि वे बहुत नरम दिखते हैं, तो रिपब्लिकन खेमे का कट्टर राष्ट्रवादी वर्ग असंतुष्ट होगा; यदि वे पूर्ण युद्ध में उतरते हैं तो आर्थिक और राजनीतिक जोखिम बढ़ेंगे, इसलिए उनकी नीति लगातार दबाव और सीमित संयम के बीच झूलती दिखाई देती है। ट्रंप का यह कहना कि ईरान ‘युद्ध और शांति की दहलीज पर खड़ा है’, अतिशयोक्ति नहीं लगता। 

वास्तव में पूरा क्षेत्र इसी अस्थिर संतुलन पर टिका हुआ है। भारत के लिए यह परिस्थिति संवेदनशील है। उसके गहरे संबंध ईरान, इसराइल और अमेरिका तीनों से हैं। ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह, पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासी, रक्षा सहयोग और व्यापार सभी दांव पर हैं, इसलिए हमें संतुलित, व्यावहारिक और बहुध्रुवीय कूटनीति अपनानी होगी। भारत के हित युद्ध में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता में निहित हैं।