World Environment Day: कागजी दावे छोड़ उन्नाव के वन कर्मियों ने कर दिखाया कमाल... बंजर भूमि को 'सीडबॉल' तकनीक से बनाया 'ऑक्सीजन हब'

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Published By Muskan Dixit
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कांटों वाले बबूल के जंगल को औषधीय पेड़ों से कर दिया हरा-भरा 

लोकेंद्र सिंह, हसनगंज/उन्नाव, अमृत विचार। पर्यावरण संरक्षण के दावों के बीच समदपुर भावा वन क्षेत्र बेहतरीन मिसाल बनकर उभरा है। बीते 7 वर्षों में यहां तैनात रहे दो वन रेंजर देवदत्त पाल व राजवीर सिंह सेंगर ने अपनी कार्यकुशलता व प्रकृति प्रेम से एक बंजर व बबूल के कांटों से घिरे इलाके को नीम के घने जंगलों में तब्दील कर दिया है। अब यह क्षेत्र स्थानीय पर्यावरण के लिए 'ग्रीन लंग्स' की तरह काम कर रहा है। 

बता दें कि कागजी खानापूर्ति से दूर, रेंजरों ने बीट प्रभारी मदनपाल, संजीव सिंह व स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर धरातल पर काम किया। इस अभियान की सबसे खास बात 'सीडबॉल' तकनीक का उपयोग रहा। वर्मी कंपोस्ट व मिट्टी मिलाकर तैयार की जाने वाली इन सीडबॉल्स से हजारों नीम के पौधे उगाए गए। यह पौधा रोपने का एक बेहद सस्ता व प्रभावी तरीका है। केवल पौधे लगाने तक ही जिम्मेदारी सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी नियमित मॉनिटरिंग भी की गई। जिससे पौधों के जीवित रहने की दर बेहद शानदार रही। स्थानीय निवासियों ने वन विभाग के इस विजन की सराहना कर कहा कि बढ़ते तापमान व प्रदूषण के दौर में यह प्रयास भावी पीढ़ियों के लिए वरदान साबित होगा। यह मॉडल साबित करता है कि यदि सही दिशा व दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निरंतर प्रयास किया जाएं तो दम तोड़ती प्रकृति को पुनः जीवंत किया जा सकता है।

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नीम के चयन से बदला पर्यावरण

रेंजर राजवीर सिंह व देवदत्त पाल के मुताबिक, नीम का पेड़ कम पानी में भी जीवित रहने के साथ हवा को शुद्ध करने व औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण बेहद प्रभावी है। जहां पहले इस क्षेत्र में सिर्फ कटीली झाड़ियां थीं, आज वहां नीम की शीतल छांव है।

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