पर्याप्त आहार से वंचित नौनिहाल, देश कैसे बनेगा खुशहाल
एनएफएचएस-6 के नवीनतम आंकड़ों ने भारत में बाल पोषण की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता उजागर की है। देश में 6-23 माह की आयु के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त और संतुलित आहार मिल पा रहा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6) के नवीनतम आंकड़ों ने भारत में बाल पोषण की स्थिति को लेकर एक गंभीर चिंता उजागर की है। सर्वेक्षण के अनुसार छह से 23 माह की आयु के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त और संतुलित आहार मिल पा रहा है। यद्यपि यह आंकड़ा एनएफएचएस-5 के 11 प्रतिशत की तुलना में कुछ बेहतर है, फिर भी यह दर्शाता है कि देश के लगभग 85 प्रतिशत छोटे बच्चे अभी भी उस पोषण से वंचित हैं, जो उनके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है. जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है तथा सरकार द्वारा कई पोषण योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। जीवन के पहले दो वर्ष किसी भी बच्चे के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस अवधि में बच्चे का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है और शरीर की वृद्धि भी अत्यधिक गति से होती है। यदि इस समय उचित मात्रा में ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज तत्व न मिलें, तो उसका प्रभाव जीवनभर बना रह सकता है।
कुपोषण के कारण बच्चों में अवरुद्ध वृद्धि, कम वजन, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी तथा सीखने की क्षमता में गिरावट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार छह माह की आयु के बाद बच्चों को केवल स्तनपान पर्याप्त पोषण नहीं दे सकता, इसलिए उन्हें विविध प्रकार के पूरक आहार की आवश्यकता होती है। ऐसे में एनएफएचएस-6 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बड़ी संख्या में भारतीय बच्चे अपने विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरण में आवश्यक पोषण से वंचित हैं।
पर्याप्त आहार का अर्थ केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि भोजन में भी आवश्यक है। बच्चों को अनाज, दालें, दूध एवं दुग्ध उत्पाद, फल, सब्जियां, अंडे तथा अन्य पोषक खाद्य पदार्थ नियमित रूप से मिलने चाहिए। आर्थिक कठिनाइयों, जागरूकता की कमी और सामाजिक मान्यताओं के कारण परिवार बच्चों को संतुलित भोजन उपलब्ध नहीं करा पाते। कई बार माता-पिता यह नहीं जानते कि छोटे बच्चों को किस प्रकार का भोजन और कितनी मात्रा में दिया जाना चाहिए। परिणामस्वरूप बच्चे पर्याप्त कैलोरी तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है।
भारत में कुपोषण की समस्या केवल गरीबी तक सीमित नहीं है। अनेक अध्ययनों से पता चला है कि मध्यम आय वर्ग के परिवारों में भी बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इसका एक प्रमुख कारण पोषण संबंधी जानकारी का अभाव है। कई परिवारों में छह माह के बाद भी बच्चों को केवल दूध या बहुत सीमित प्रकार का भोजन दिया जाता है। कुछ क्षेत्रों में अंडा, मांस या अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक धारणाएं भी बच्चों के पोषण को प्रभावित करती हैं। इसके अतिरिक्त महिलाओं की शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य और स्वच्छता की स्थिति भी बाल पोषण से गहराई से जुड़ी हुई है।
सरकार एकीकृत बाल विकास सेवा, पोषण अभियान, आंगनबाड़ी सेवाएं, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना तथा मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं से पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पूरक पोषण उपलब्ध कराया जाता है। पोषण अभियान के तहत तकनीक और जन-जागरूकता के माध्यम से कुपोषण को कम करने का लक्ष्य रखा गया है, हालांकि यह प्रगति अभी बहुत धीमी है और लक्ष्य से काफी दूर है।
कोविड-19 महामारी का प्रभाव भी बाल पोषण पर पड़ा था। लॉकडाउन और आर्थिक गतिविधियों में कमी के कारण अनेक परिवारों की आय प्रभावित हुई है। इससे पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और पहुंच पर नकारात्मक असर पड़ा। कई आंगनबाड़ी केंद्रों और सामुदायिक सेवाओं का संचालन भी बाधित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बच्चों तक पोषण सेवाएं नियमित रूप से नहीं पहुंच सकीं। यद्यपि महामारी के बाद स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन उसके प्रभाव अभी भी कई क्षेत्रों में दिखाई देते हैं।
बाल पोषण केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक और आर्थिक विकास से भी जुड़ा हुआ है। कुपोषित बच्चे भविष्य में कम उत्पादक नागरिक बन सकते हैं, जिससे मानव संसाधन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। विश्व बैंक के अनुसार कुपोषण किसी भी देश की आर्थिक प्रगति को बाधित कर सकता है, क्योंकि इससे स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है और कार्य क्षमता कम होती है, इसलिए बच्चों को पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराना केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक निवेश भी है।
इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले माता-पिता और समुदायों में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ानी होगी। स्वास्थ्य कर्मियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को परिवारों तक सही जानकारी पहुंचाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, क्योंकि शिक्षित माताएं बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक होती हैं।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों के उपयोग को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है। मिलेट्स, दालें, हरी सब्जियां, फल और अंडे जैसे सस्ते तथा पोषक विकल्पों को बच्चों के आहार में शामिल करने के लिए अभियान चलाए जाने चाहिए। साथ ही स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में सुधार भी आवश्यक है, क्योंकि बार-बार होने वाले संक्रमण बच्चों के पोषण स्तर को प्रभावित करते हैं। एनएफएचएस-6 के आंकड़े यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारत ने बाल पोषण के क्षेत्र में कुछ प्रगति अवश्य की है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
