याद आते हैं वो रेडियो वाले पुराने दिन...
आज के इस चमचमाते डिजिटल और स्क्रीन युग में, जहां आंखें थका देने वाले रील्स और वीडियो की आदी हो चुकी हैं, ज़रा अपनी आँखें बंद करके सोचिए- क्या आपको वह सोंधी सी आवाज़ याद है? सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ गूंजती वह एक सिग्नेचर ट्यून और फिर एक गंभीर, आत्मीय आवाज़ का कानों में रस घोलना- ‘यह आकाशवाणी है।’ समय की तेज रफ्तार के बीच, अदृश्य तरंगों के सहारे देश के कोने-कोने को एक सूत्र में पिरोने वाले हमारे इस सबसे प्यारे हमसफ़र यानी रेडियो ने अपने गौरवमयी 90 साल पूरे कर लिए हैं। यह महज़ एक यांत्रिक उपकरण की यात्रा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, हमारी संस्कृति और तीन पीढ़ियों के बदलते भारत की जीती-जागती दास्तान है।
बचपन की यादें और वो सांध्यकालीन बैठकें
एक दौर था जब घर की सबसे आलीशान जगह पर एक मखमली कवर या स्वेटर के गिलाफ में लिपटा हुआ 'ट्रांजिस्टर' रखा होता था। वह घर का कोई निर्जीव उपकरण नहीं, बल्कि परिवार का एक सम्मानित सदस्य हुआ करता था। सुबह 'वंदना' और 'मंगलाचरण' से घर की शुरुआत होती थी, दोपहर में गृहणियों के काम के बीच सखी-सहेली की गूंज होती थी, और शाम को पुरुषों की चौपाल सजती थी समाचार सुनने के लिए।
रेडियो की सबसे बड़ी खूबसूरती यही थी कि इसमें 'चित्र' नहीं थे, इसलिए इसने इंसानी दिमाग को कल्पना करने की अद्भुत शक्ति दी। जब हवा में तैरती किसी आवाज़ ने कोई कहानी सुनाई, तो सुनने वाले हर व्यक्ति ने अपने दिमाग में उसका एक अलग और सुंदर चित्र बनाया। यह बिना देखे भी दिलों को जोड़ लेने का एक जादुई हुनर था।
सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का इकलौता सेतु
भारत के इतिहास का शायद ही कोई ऐसा पड़ाव हो, जिसका गवाह रेडियो न रहा हो। देश की आज़ादी की घोषणा हो, हरित क्रांति के दौरान किसानों तक नई तकनीकों को पहुँचाना हो, या फिर युद्ध के कठिन समय में देश का हौसला बढ़ाना हो— रेडियो हमेशा अग्रिम मोर्चे पर डटा रहा।
मनोरंजन के क्षेत्र में तो रेडियो का कोई सानी ही नहीं था। 'विविध भारती' की सुरीली तरंगों ने फिल्मी गीतों को घर-घर पहुँचाया। 'हवामहल' के नाटकों की वो नाटकीय आवाज़ें आज भी कानों में मिश्री सी घोल देती हैं। अमीन सयानी की जादुई आवाज़ में ‘भाइयों और बहनों’ सुनना हो या क्रिकेट की कमेंट्री सुनते हुए कौतूहल से भर जाना- रेडियो ने मनोरंजन को एक बेहद शालीन और सुसंस्कृत रूप दिया।
बनारस की सुबह और आकाशवाणी का रिश्ता
सांस्कृतिक राजधानी बनारस के संदर्भ में देखें, तो यहाँ की सुबह तो बिना रेडियो के अधूरी सी लगती है। गंगा के घाटों पर सुबह की अज़ान और शंखध्वनि के बीच जब किसी चाय की दुकान या घर के आंगन में आकाशवाणी वाराणसी केंद्र से लोकगीत या शास्त्रीय संगीत की तान छिड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो बनारस की आत्मा सुरों में तब्दील हो गई हो। रेडियो ने हमारी क्षेत्रीय बोलियों, लोक कलाओं और स्थानीय कलाकारों को जो मंच दिया, वह अमूल्य है।
डिजिटल बूम के दौर में भी अडिग पहचान
जब टीवी आया, फिर इंटरनेट आया और अब जब सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का बोलबाला है, तब कई विश्लेषकों ने कहा था कि शायद रेडियो का वजूद खत्म हो जाएगा। लेकिन नौ दशकों का यह हमसफ़र थककर हार मानने वाला नहीं था। रेडियो ने समय के साथ खुद को बदला और एक नए अवतार में हमारे सामने आया।
आज स्मार्टफोन के भीतर एफएम (FM) के रूप में, गाड़ियों के डैशबोर्ड पर और इंटरनेट पर 'पॉडकास्ट' के रूप में रेडियो आज की युवा पीढ़ी की धड़कन बना हुआ है। देश के प्रधानमंत्री जब देशवासियों से सीधे जुड़ना चाहते हैं, तो वे भी 'मन की बात' के लिए इसी माध्यम को चुनते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि देश के सबसे आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचने का माध्यम आज भी सिर्फ रेडियो ही है। आपदा के समय जब मोबाइल नेटवर्क फेल हो जाते हैं, तब भी यही अदृश्य तरंगें जीवन रक्षक बनती हैं।
90 साल का यह लंबा सफर गवाह है कि माध्यम बदलते हैं, तकनीक बदलती है, लेकिन आत्मीयता का अहसास कभी नहीं बदलता। रेडियो आज भी ज़िंदा है क्योंकि यह हमें अकेला नहीं छोड़ता; यह एकांत का साथी है। बदलते वक्त के साथ भले ही इसके रूप-रंग बदल गए हों, लेकिन आज भी जब हवा के झोंकों पर तैरती कोई पुरानी धुन कानों से टकराती है, तो दिल अनायास ही गुनगुना उठता है। नौ दशकों से दिलों को जोड़ने वाली इन तरंगों को हमारा सलाम।
-मंजरी तिवारी लेखक एवं पत्रकार
