इंटरनेट स्पीड को सौ गुणा करेगी नई माइक्रोचिप  

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक इनोवेटिव ऑप्टिकल माइक्रोचिप  बनाया है, जिसका आकार उंगली के सिरे जितना है। स्टैनफोर्ड की छोटी सी चिप  इंटरनेट को 100 गुना तेज़ बना सकती है और वह भी कम बिजली खर्च करके। इस माइक्रोचिप (मेमोरी चिप या ग्राफ़िक प्रोसेसिंग यूनिट) के बाजार में उपलब्ध होने से हाई स्पीड डाटा कम्युनिकेशन के लिए एक बेहतर एम्प्लिफ़िएर के तौर पर इस नयी चिप से डाटा ट्रान्सफर की स्पीड 100 गुना बढ़ जाएगी, ऐसा तजुर्बों ने दिखाया है।

एम्पलीफायर चिप एक इंटीग्रेटेड सर्किट होता है जो इलेक्ट्रिक सिग्नल की पावर, वोल्टेज या करंट को बढ़ाता है। यह एक कमज़ोर इनपुट सिग्नल को एक मज़बूत आउटपुट सिग्नल में एम्पलीफाई करता है और जो स्पीकर्स, सेंसर्स, एंटेना या अन्य डिवाइस को चला सकता है।

इंटीग्रेटेड सर्किट्स का ग्लोबल बाज़ार

एम्पलीफायर चिप का मुख्य काम आने वाले सिग्नल को बिना ज़्यादा बिगाड़े एम्पलीफाई करना होता है। यह काम ट्रांजिस्टर्स के इस्तेमाल से किया जाता है, जो करंट के बहाव को कंट्रोल करते हैं। इस प्रक्रिया में एक कम-लेवल का इनपुट सिग्नल लेना, ट्रांजिस्टर्स का इस्तेमाल करके सिग्नल को एम्पलीफाई और मॉड्युलेट करना और फिर आउटपुट को ओरिजिनल सिग्नल के एक बड़े रूप में बढ़ाना शामिल है। इसमें सिग्नल का आकार और फ्रीक्वेंसी वही रहती है, लेकिन वोल्टेज या करंट ज़्यादा होता है।

एम्पलीफायर चिप्स आज के इलेक्ट्रॉनिक्स में बहुत ज़रूरी हिस्से हैं, जो ऑडियो सिस्टम, टेलीकम्युनिकेशन और कई दूसरी जगहों पर अहम भूमिका निभाते हैं। इनका इस्तेमाल लगभग हर उस इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में होता है, जिसे हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं, जैसेकि स्मार्टफोन और टेलीविज़न से लेकर मेडिकल उपकरणों और इंडस्ट्रियल कंट्रोल सिस्टम तक में। एम्पलीफायर इंटीग्रेटेड सर्किट्स का ग्लोबल बाज़ार लगातार बढ़ रहा है। सन 2024 में यह ₹40 करोड़ तक पहुंच गया, जिसकी मुख्य वजह कारों, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और 5 जी व इलेक्ट्रिक गाड़ियों जैसी नई टेक्नोलॉजी की बढ़ती माँग है।

क्या कहती है रिपोर्ट

यह छोटा सा डिवाइस, बिजली की खपत को काफी हद तक कम करके, हाई-स्पीड डेटा कम्युनिकेशन के तरीके को बदल सकता है। पारंपरिक एम्पलीफायर आमतौर पर बड़े होते हैं और ज़्यादा बिजली खर्च करते हैं, लेकिन यह नई चिप अलग है। इसमें एक रेसिंग ट्रैक जैसा रेज़ोनेटर लगा है जो रोशनी को रीसायकल करता है, जिससे सिग्नल की ताकत 100 गुना बढ़ जाती है, और बिजली भी बहुत कम खर्च होती है।

अगली पीढ़ी की क्वांटम और क्लासिकल फोटोनिक्स के लिए इस नयी चिप का बेहद महत्त्व है। 1950 आदि दशक में माइक्रो चिप और इंटीग्रेटेड सर्किट्स की ईजाद करने वाले जैक किल्बी और रॉबर्ट नॉयस के बाद के सत्तर साल के अरसे में इस टेक्नोलॉजी में हर दो साल में जो परिवर्तन हुए उनसे गॉर्डोन मूर की भविष्यवाणी सही साबित हुयी।

इंटेल के सह-संस्थापक और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के एक अग्रणी व्यक्ति, गॉर्डन मूर को मुख्य रूप से उनकी उस भविष्यवाणी के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक माइक्रोचिप पर ट्रांजिस्टरों की संख्या हर दो साल में दोगुनी हो जाएगी। इसे मूर का नियम कहा गया जो सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत रही है। मूर की दूरदृष्टि आधुनिक कंप्यूटिंग के विकास और पर्सनल कंप्यूटर क्रांति के उदय में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई है। कंप्यूटिंग क्षमता और कार्यक्षमता में अपेक्षित वृद्धि के लिए यह आज भी एक मानक है। 

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार, इस तरक्की से एडवांस्ड फोटोनिक्स के लिए दरवाज़े खुल गए हैं, जिससे यह स्मार्टफोन और रिमोट सेंसर जैसे पोर्टेबल, बैटरी से चलने वाले गैजेट्स में भी इस्तेमाल हो सकेगा। फाइबर-ऑप्टिक जैसी क्वालिटी वाले सिग्नल के लिए ज़रूरी टेक्नोलॉजी का आकार छोटा करके, शोधकर्ताओं ने बड़े टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम को छोटे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स से सफलतापूर्वक जोड़ दिया है।

इससे भविष्य में तेज और ज्यादा असरदार ग्लोबल कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है। इस चिप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह रोशनी के सिग्नल को 100 गुना तक बढ़ा सकती है और वह भी सिर्फ कुछ सौ मिलीवॉट बिजली खर्च करके। पहले, ऑप्टिकल एम्पलीफायर को बहुत ज्यादा बिजली और जगह की जरूरत होती थी, जिसकी वजह से वे सिर्फ बड़े डेटा सेंटर या समुद्र के नीचे बिछी केबलों तक ही सीमित थे, लेकिन यह नया डिवाइस इस पूरी स्थिति को बदल देता है। 

लिथियम नायोबेट की एक पतली परत पर बना यह डिवाइस, ‘रेजोनेंट’ आर्किटेक्चर नाम की एक खास तकनीक का इस्तेमाल करता है। रोशनी चिप पर बने एक बहुत छोटे से ट्रैक पर हजारों बार चक्कर लगाती है। इस प्रक्रिया से स्टिम्युलेटेड एमिशन के ज़रिए रोशनी की तीव्रता बढ़ जाती है, ठीक वैसे ही जैसे लेजर काम करती है, लेकिन कम्युनिकेशन सिग्नल के मामले में यह तकनीक बिजली की बहुत ज्यादा बचत करती है।

लिथियम, नायोबियम और ऑक्सीजन से बना हुआ लिथियम नायोबेट एक बहुमुखी सिंथेटिक क्रिस्टल है, जिसका उपयोग ऑप्टिक्स, फोटोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में इसकी मजबूत नॉन-लीनियर, पीजोइलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक विशेषताओं के कारण किया जाता है। अगली पीढ़ी की ऑप्टिकल चिप्स के लिए लिथियम नायोबेट मुख्य सामग्री बन सकती है। शोधकर्ताओं ने लिथियम नायोबेट नाम की सामग्री पर काम किया। 

 यह सामग्री रासायनिक रूप से स्थिर है, इसका गलनांक 1250°C से अधिक होता है और यह तापमान में होने वाले बदलावों के बावजूद अपना प्रदर्शन बनाए रखती है। ऑप्टिक्स की दुनिया में यह सामग्री इसलिए लोकप्रिय है, क्योंकि जब इस पर बिजली प्रवाहित की जाती है, तो यह रोशनी का रास्ता बदल सकती है। स्टैनफोर्ड की टीम ने थिन-फिल्म-ऑन-इंसुलेटर नाम की एक नई तकनीक विकसित की, इस तकनीक की मदद से वे रोशनी को पहले से कहीं ज़्यादा असरदार तरीके से एक जगह रोक पाने में कामयाब रहे। रोशनी को इस तरह मज़बूती से एक जगह रोकने की वजह से ही, वे एम्पलीफायर को उंगली के सिरे जितना छोटा बनाने के बाद भी, उसे उतना ही असरदार बनाए रखने में सफल रहे। इन चिप्स को आम कंप्यूटर मदरबोर्ड और मोबाइल डिवाइस पर लगाने के लिए एम्पलीफायर का आकार छोटा करना बहुत जरूरी है।

डिफेंस कम्युनिकेशन में सहायक

6-जी नेटवर्क बनाने में कम-पावर वाली चिप्स की जरूरत है। यह भूमिका शायद यह नई चिप टेक्नोलॉजी बेहतर तरीके से अदा कर पाएगी। यह चिप सिर्फ इंटरनेट की स्पीड ही नहीं बढ़ाती, बल्कि इसे बहुत कम पावर की भी जरूरत होती है। थिन-फिल्म लिथियम नायोबेट क्वांटम कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा सेंटर्स के लिए बहुत तेज मॉड्यूलेटर और इंटीग्रेटेड फोटोनिक सर्किट्स को संभव बनाता है।

जाहिर है डिफेंस कम्युनिकेशन, हमलवार ड्रोंस और सेल फोंस के लिए इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कमाल कर सकता है। यह सेल फोन की बैटरी लाइफ को ही काफी बढ़ा देगा। यह बात ऊर्जा उत्पादन करने वाले कंपनियों के लिए अहम बात होगेई। ट्रांसमिशन के दौरान पैदा होने वाली गर्मी को कम करना भविष्य के 6-जी नेटवर्क और LiDAR अर्थात लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग, जैसी सेल्फ़-ड्राइविंग कारों में लगे सेंसर के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यह चिप बैटरी से भी चल सकती है, इसलिए यह ड्रोन या सैटेलाइट को ज़्यादा वज़न बढ़ाए बिना या ज़्यादा पावर इस्तेमाल किए बिना बहुत सारा डेटा भेजने में मदद कर सकती है।

इससे अंतरिक्ष की खोज और दूर से पर्यावरण की निगरानी करने वाले सरकारी प्रोजेक्ट्स में मदद मिलेगी। लूपिंग रेजोनेटर रोशनी के इंटरैक्शन की लंबाई बढ़ाते हैं जो छोटे एम्पलीफायर में गेन-सैचुरेशन जैसी आम समस्या को हल करता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विज्ञानियों ने एक लूपिंग रेजोनेटर का इस्तेमाल किया, जो बड़ी हो रही चिप के बिना ही रोशनी के ‘इंटरैक्शन की लंबाई’ को बड़ी होशियारी से बढ़ा देता है।

रोशनी सिर्फ़ एक बार गुजरने के बजाय, गेन मीडियम से कई बार गुज़रती है। इससे वह कम पावर वाले पंप सोर्स से ज्यादा फोटॉन इकट्ठा कर पाती है, जिससे आउटपुट बेहतर होता है और वह आम ‘शोर’ कम हो जाता है, जो अक्सर तेज कम्युनिकेशन में सिग्नलों में रुकावट डालता है।

- रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक