अमीनाबाद से हजरतगंज तक: कैसे नवाब अमजद अली शाह और वजीर अमीनुद्दौला ने बदला लखनऊ के बाजारों का भूगोल?
(अनेहस शाश्वत, अवध आख्यान) लखनऊः इस बार बात होगी नवाब हजरत अमजद अली शाह की, जो मुहम्मद अली शाह के बेटे थे और अवध के सबसे चर्चित नवाब वाजिद अली शाह के बाप थे। इन की कहानी भी दिलचस्प है। इनके नवाब बनने का कोई संभावना नहीं थी। ये तो जब नसीरुद्दीन हैदर को मार डालने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने बूढ़े मुहम्मद अली शाह को नवाब बनाया तो मात्र 5 साल बाद उनकी मौत के बाद बड़े बेटे होने के नाते अमजद अली शाह नवाब बने। वैसे अवध के शाही परिवार से तो थे ही इसलिए नवाब नहीं बनते तो भी कोई कमी तो थी नहीं। युवावस्था से ही इनका ध्यान धार्मिक कार्यकलापों की ओर ज्यादा था इसीलिये लोग इन्हें हजरत कहकर भी संबोधित करते थे, जो इनकी धार्मिक गतिविधियों के कारण इनके लिए एक आदरयुक्त संबोधन था। मुहम्मद अली शाह के नवाब बनने से पहले तक ये सामान्य धार्मिक पारिवारिक जीवन बिताते थे। मलिका किश्वर से इनका विवाह हुआ था, जो वाजिद अली शाह के नवाब बनने के बाद राजमाता बनी और ईस्ट इंडिया कंपनी और वाजिद अली शाह के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हुआ करती थीं और नवाब अपनी माता की बात टालते नहीं थे ।
बहरहाल अमजद अली शाह की नवाबी के दौरान अवध में धार्मिक गतिविधियों को बहुत बढ़ावा मिला और शिया धर्म के एक प्रमुख केंद्र के रूप में लखनऊ को नई पहचान मिली, इनके नवाब बनने से पहले चौक लखनऊ का प्रसिद्ध बाजार हुआ करता था। अमजद अली शाह के अहद में दो नए बाजार बने। इनके वजीर अमीनुद्दौला ने अमीनाबाद बसाया और अमजद अली शाह ने हजरतगंज बसाया, जिसका नामकरण इनके नाम पर ही हुआ। यहीं हजरतगंज में नवाब का मकबरा भी है सिबतैनाबाद नाम से, जिसे उनके बेटे वाजिद अली शाह ने उस समय दस लाख रुपये की लागत से बनवाया। सन् 1842 में नवाब बने अमजद अली शाह की मौत भी मात्र 5 साल बाद ही सन् 1846 में ही हो गई। अमजद अली शाह के काफी पहले से ही अवध के वास्तुशिल्प में यूरोपियन शैली का मिश्रण हो चुका था, सो हजरतगंज भी इंडो पर्शियन और यूरोपियन शैली का बेहतरीन बाजार बना जो अंग्रेजों को भी बहुत पसंद था, उन्होंने भी इसमें बहुत कुछ जोड़ा नतीजे में आज हजरतगंज भी लखनऊ की एक नायाब पहचान के तौर पर जाना जाता है। जनहित के और भी काम अमजद अली शाह ने किए, लेकिन उनको उनके धार्मिक कार्यकलापों और हजरतगंज के निर्माता के तौर पर अवध के इतिहास में ज्यादा याद किया जाता है।
आइए अब जाने अमजद अली शाह की जिंदगी का सबसे दिलचस्प किस्सा। जैसा मैंने बताया, अमजद अली शाह के नवाब बनने की कोई संभावना नहीं थी, सो एक सामान्य धार्मिक गृहस्थ के तौर पर वे खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रहे थे, कालांतर में भाग्य और अवसर के धक्के से वे नवाब बने। अब जब वे नवाब बन गए तो दरबारियों ने चिमगोइयां शुरू की कि ये कैसे नवाब हैं, जिनकी कुल एक ही बेगम है। जब चर्चा ने काफी जोर पकड़ा तो दरबारियों ने कहा कि हुजूर अब बहुत हुआ कम से कम एक और निकाह तो आपको कर ही लेना चाहिए। दरबारियों ने इस बात को लेकर ऐसा समा बांधा कि नवाब तैयार हो गए, लेकिन शर्त रही कि किसी सामान्य औरत से निकाह करेंगे। फिर उनका दूसरा निकाह मलिका अहद से हुआ जो एक सामान्य सैयद परिवार की बेटी थीं। नवाब उस समय हजरतगंज बसा रहे थे, सो नई बेगम के रहने के लिए वहीं पर एक शानदार कोठी बनवा दी गई जो बेगम कोठी के नाम से जानी गई। ये कोठी वहीं पर थी, जहां आज जनपथ मार्केट है। सत्तर के दशक तक ये कोठी मौजूद थी और उसमें डाकखाना हुआ करता था। बाद में कोठी को गिराकर वहां जनपथ मार्केट बनवा दिया गया।
नवाब के हजरतगंज स्थित मकबरे का हाल भी बेहाल हुआ, दरअसल सन् 1857 में जो लड़ाई हुई, उसके बाद नवाबीन की कई संपत्तियों पर अंग्रेजों ने और दूसरे तमाम लोगों ने कब्जा कर लिया। जिन इमारतों पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया, वे कालांतर में भवन स्वामियों और भारत सरकार को सौंप दी गई। मसलन छतर मंजिल अंग्रेजों के हाथ से होती हुई भारत सरकार को मिली जिसमें सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट शुरू कर दिया गया। अब इस भवन को नए सिरे से संवार कर इसमें संग्रहालय बनाने की योजना उत्तर प्रदेश सरकार की है। उसी तरह नवाब का मकबरा शहर के मुख्य बाजार हजरतगंज में था, इसलिए उस पर भी कई लोगों ने कब्जा कर लिया और व्यावसायिक काम करते रहे। अभी कुछ सालों पहले ही शिया वक्फ बोर्ड ने इस मकबरे को अवैध कब्जों से मुक्त कराकर इसे पहले जैसा रूप दिया और अब ये काफी हद तक पहले जैसा देखने योग्य मकबरा हजरतगंज में ही है, जिसे उसी व्यक्ति ने बसाया, जिसका ये मकबरा है।
