Iran-US Agreement : ईरान-अमेरिका के शांति समझौते का ऐलान, होर्मुज पर सहमति; जानिए भारत के लिए क्या है अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और निर्यात?
तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले 107 दिनों से जारी भीषण युद्ध आखिरकार समाप्त होने जा रहा है। दोनों देशों के बीच युद्ध को खत्म करने और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने पर ऐतिहासिक सहमति बन गई है। इस बड़े घटनाक्रम से वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार को बहुत बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
मुख्य मध्यस्थ पाकिस्तान और अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस शांति समझौते पर आगामी शुक्रवार (19 जून) को स्विट्जरलैंड में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए जाएंगे। ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे बेहद संवेदनशील और अहम मुद्दों पर बाद के चरणों में चर्चा की जाएगी।
राष्ट्रपति ट्रंप ने की नाकाबंदी हटाने की पुष्टि
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की पुष्टि करते हुए घोषणा की है कि उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित ईरानी बंदरगाहों से अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी हटाने को मंजूरी दे दी है।
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राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "इस्लामिक गणराज्य ईरान के साथ समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है। सभी को बधाई। मैं मुक्त आवाजाही के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की मंजूरी देता हूं।"
इस समझौते के तहत अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाने के साथ-साथ प्रतिबंधों में भी ढील देने पर सहमत हुआ है, ताकि ईरान अधिक मात्रा में तेल बेच सके और युद्ध व प्रतिबंधों से प्रभावित अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल सके।
दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टेलीविजन पर समझौते की पुष्टि तो की, लेकिन स्पष्ट किया कि शुक्रवार को औपचारिक हस्ताक्षर होने से पहले ईरान इसे लागू करना शुरू नहीं करेगा। यह सहमति मध्यस्थ कतर के प्रतिनिधि के साथ तेहरान में चली 14 घंटे लंबी मैराथन वार्ता के बाद बनी है।
भारत के निर्यात और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (India Export Impact)
अमेरिका-ईरान के बीच हुए इस शांति समझौते और होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से भारतीय अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर बड़ी राहत मिलने जा रही है। विशेषज्ञों और निर्यातकों का मानना है कि इससे पश्चिम एशिया (खाड़ी देशों) को होने वाले भारत के निर्यात में भारी तेजी आएगी, घरेलू विनिर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी और डॉलर के मुकाबले रुपये को मजबूती मिलेगी।
ऊर्जा आयात की लागत और महंगाई पर नियंत्रण
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सबसे ज्यादा पश्चिम एशिया पर निर्भर है। देश का लगभग 50% कच्चा तेल, 70% एलपीजी और 90% एलएनजी इसी क्षेत्र से आता है। युद्ध के दौरान खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही ठप होने से भारत की आयात लागत बढ़ गई थी और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। आर्थिक शोध संस्थान 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से तेल-गैस की कीमतें स्थिर होंगी, जिससे भारत में महंगाई नियंत्रित होगी।
मालभाड़ा और बीमा लागत में कमी
युद्ध के कारण भारतीय जहाजों को अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ रहा था। इससे मालभाड़ा (Freight) और जहाजों की बीमा लागत अत्यधिक बढ़ गई थी और सामान पहुंचने में देरी हो रही थी। अब अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग सुचारू होने से यह संकट दूर हो जाएगा।
खाड़ी देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में सुधार
28 फरवरी को शुरू हुए इस युद्ध का भारत के निर्यात पर बेहद बुरा असर पड़ा था। मार्च में देश का कुल निर्यात 7.44% घटकर 38.92 अरब डॉलर रह गया था, जो 5 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट थी। वहीं, पश्चिम एशिया को होने वाला निर्यात 57.95% घटकर महज 3.5 अरब डॉलर रह गया था (जो सामान्य तौर पर 6 अरब डॉलर रहता है)। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा भी बढ़ा था, जिसमें अब सुधार आने की उम्मीद है:
संयुक्त अरब अमीरात (UAE): भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2025-26 में यहां 37.4 अरब डॉलर का निर्यात और 63.9 अरब डॉलर का आयात हुआ।
सऊदी अरब: पांचवां सबसे बड़ा साझेदार, जहां निर्यात 12.55% घटकर 11.28 अरब डॉलर रहा था।
अन्य देश: कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन के साथ भी युद्ध के कारण व्यापार घाटे की स्थिति बनी हुई थी, जो अब सामान्य होगी।
प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को मिलेगी नई रफ्तार
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) के अध्यक्ष एस. सी. राल्हन और टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के चेयरमैन शरद कुमार सराफ के मुताबिक, यह शांति समझौता 'विकसित भारत' के लक्ष्य को गति देगा। भारत के प्रमुख निर्यात उत्पाद जैसे—इंजीनियरिंग सामान, रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद, चावल, मांस, रत्न एवं आभूषण, दवाएं, रसायन और वस्त्र—एक बार फिर खाड़ी देशों के बाजारों में अपनी मजबूत पकड़ बना सकेंगे।
