Happy Father's Day: मां की तरह 'बहलाता' नहीं, गलतियों पर 'कूटता' है पिता... क्योंकि वह आपको खुद से आगे देखना चाहता है!
नीरज मिश्र, लखनऊ, अमृत विचार: पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है। पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है। पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ति है। पिता रक्त में दिये हुए संस्कारों की मूर्ति है। पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है। पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है। जब मन द्रवित होता है तो पंडित ओम व्यास की यह कविता एक ''संबल'' दे जाती है।
रविवार को पिता दिवस मनाया जाएगा। पश्चिमी संस्कृति से जुड़े लोग भले ही सोशल मीडिया पर ''हैप्पी फादर्स डे'' बोल अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें लेकिन भारत में पिता एक बहुत बड़ी और मजबूत शख्सियत का नाम है। पिता ने बच्चे की आवश्यकताओं के लिए कभी हारना नहीं सीखा।
जरा सोचिए! पिता के वचन की लाज रखने के लिए ही तो राम ने 14 बरस जंगल में गुजार दिये। दरअसल पिता अनुशासन का पाठ होता है। पूरी जिन्दगी खुद को अनुशासन के आवरण में ढांपकर जिंदगी को जीता रहता है... बच्चे का भविष्य बनाते-बनाते उसकी खुद की रौनक गायब हो जाती है। पर उसे परवाह नहीं रहती। बच्चे का भविष्य संवारते-संवारते वह कब बूढ़ा हो जाता है, यह भी नहीं जान पाता। जब वह बच्चे को समाज में स्थापित कर लेता है तो कमजोर और बूढ़ी काया वाला पिता हिमालय सा मजबूत होकर खड़ा हो जाता है।
मां की तरह ''बहलाता'' नहीं ''कूटता'' ज्यादा है
पिता गलतियों पर ''कूटता'' ज्यादा ''दुलराता'' कम है। वो मां की तरह बहलाता नहीं क्योंकि पिता बच्चे को खुद से आगे देखना चाहता है। पिता कैसे भी रह ले इसकी उसे कभी चिंता नहीं होती लेकिन बच्चे को अच्छे से अच्छा लाकर देने की कोशिश में उसकी उम्र निकल जाती है। वो हमेशा इस बात की कोशिश में रहता है कि अपने साथियों के बीच उसका बच्चा कभी हीन भावना के साथ न बैठे। इसी वजह से वह कभी पीछे नहीं हटता है।
घर से अनुपस्थिति में भी रहती है बच्चे पर नजर
घर में दिन भर की उसकी अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि बच्चे पर उसकी नजर नहीं, वो अपने बच्चे की बेहतरी के लिए ही खुद को गला रहा होता है। बच्चे की जरूरतों की खातिर वो कोल्हू के बैल सा खट रहा होता है। बच्चों की गल्तियों पर वह डांटता है, कई बार मारता है, बच्चों के सामने हमेशा वज्र जैसा बना रहता है, प्यार कम डराता ज्यादा है क्योंकि वो जानता है कि बच्चा प्यार से नहीं डर से ही आगे बढ़ेगा। बच्चे को खुद से आगे निकालना ही उसका मकसद होता है। वो कभी इस बात की चिंता नहीं करता है कि उसका बच्चा उसके बारे में क्या सोचता है। पिता जब तक रहता है तब तक उसके बारे में बच्चा समझ नहीं पाता लेकिन जब वो चला जाता है तब भीगी आंखों के साथ उसके मुंह से निकल ही जाता है कि पिता नहीं होता तो वो भी कुछ नहीं होता...पिता है तभी वो भी ...।
