यूपी विधानसभा चुनाव 2027: 2.8 करोड़ Gen-Z वोटर तय करेंगे सत्ता का गणित? भाजपा-सपा-बसपा की नजर

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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18 से 29 साल के करीब 2.8 करोड़ युवा मतदाता कुल वोटरों का लगभग 21% बताए जा रहे; रोजगार, शिक्षा, पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बन सकते हैं बड़े चुनावी मुद्दे

लखनऊ, अमृत विचार: उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरणों के साथ जेन-जी मतदाताओं की भूमिका भी अहम रहने वाली है। 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के करीब 2.8 करोड़ मतदाता प्रदेश में हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 21 प्रतिशत बताए जा रहे हैं। ऐसे में इस वर्ग के वोट में मामूली बदलाव भी करीबी मुकाबले वाली सीटों पर नतीजे बदल सकता है। भाजपा, सपा और बसपा तीनों ही दल रोजगार, शिक्षा, कौशल और डिजिटल संवाद के जरिए इस युवा वर्ग को साधने की तैयारी में हैं।

भाजपा के सामने सरकार के काम और युवा नीति को चुनावी मुद्दे में बदलने की चुनौती है। प्रस्तावित युवा नीति में 16 से 35 वर्ष के युवाओं की आकांक्षाओं को शामिल करने, राज्य युवा आयोग, जिलों में यूथ इन्क्यूबेशन सेंटर और छात्रवृत्ति व रोजगार से जुड़े मंच की योजना है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अभ्युदय जैसी व्यवस्थाओं के विस्तार पर भी जोर है। हालांकि युवाओं के बीच इन घोषणाओं से ज्यादा रोजगार, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और पेपर लीक जैसे मुद्दों का असर अहम रहेगा।

सपा रोजगार, बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी स्कूल-कॉलेज के युवाओं के बीच छोटे समूहों में संवाद और डिजिटल माध्यमों से संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रही है। अखिलेश यादव के युवा चेहरे के साथ पार्टी तकनीक और लैपटॉप से जुड़े अपने पुराने नैरेटिव को रोजगार, कौशल और सस्ती शिक्षा से जोड़ने की कोशिश कर सकती है। चुनौती यह होगी कि जेन-जी को केवल पारंपरिक सामाजिक समीकरणों के विस्तार के बजाय उसकी अलग आकांक्षाओं से जोड़ा जाए।

बसपा भी युवा राजनीति को नए सिरे से धार देने की कोशिश में है। आकाश आनंद को अधिक सक्रिय कर पार्टी रोजगार, शिक्षा, पेपर लीक, महिला सुरक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उठा रही है। पार्टी के लिए चुनौती युवा चेहरे को अपने पारंपरिक सामाजिक आधार और बूथ संगठन से जोड़ने की है। ऐसा हुआ तो कुछ सीटों पर बसपा मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर भाजपा और सपा दोनों का गणित प्रभावित कर सकती है।

जेन-जी पूरी तरह जातीय राजनीति से बाहर हो जाएगी, यह मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन रोजगार, निष्पक्ष परीक्षा, शिक्षा की लागत, कौशल के बाद अवसर और सरकारी योजनाओं की पहुंच जैसे मुद्दे इस वर्ग में साझा चिंता बन रहे हैं। यही कारण है कि 2027 में सवाल केवल यह नहीं होगा कि युवा वोट कितना है, बल्कि यह होगा कि उसमें कितना हिस्सा स्थिर और कितना स्विंग करता है।

जेन-जी पर तीनों दलों की नजर

भाजपा : युवा नीति, रोजगार, कौशल और सरकार के काम पर जोर।

सपा : बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा और डिजिटल संवाद।

बसपा : आकाश आनंद के जरिए रोजगार, सम्मान और प्रतिनिधित्व का मुद्दा।

पांच फीसदी वोट का असर

प्रदेश में 403 विधानसभा सीटें हैं और कई सीटों पर जीत-हार का अंतर कम रहा है। ऐसे में जेन-जी के वोट का छोटा हिस्सा भी एक दल से दूसरे दल की ओर खिसकने पर करीबी सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकता है। 2027 में युवा मतदाता किसी एक दल का स्वाभाविक वोट बैंक बनने के बजाय तीनों प्रमुख दलों के बीच नया चुनावी मैदान बन सकता है।

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