World Badminton Championship: ब्रॉन्ज के बाद गायत्री गोपीचंद का बड़ा ऐलान, बोलीं- अब वर्ल्ड चैंपियन बनना नामुमकिन नहीं

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीतने वाली पहली भारतीय महिला डबल्स जोड़ियों में शामिल ट्रीसा-गायत्री की नजर अब विश्व खिताब पर; सेमीफाइनल की हार से सीखा धैर्य का सबक

नई दिल्ली। बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद भारतीय बैडमिंटन स्टार गायत्री गोपीचंद का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ है। ट्रीसा जॉली के साथ शानदार प्रदर्शन करने वाली गायत्री का मानना है कि अब वर्ल्ड चैंपियन बनना कोई नामुमकिन सपना नहीं है।

ट्रीसा और गायत्री ने पिछले 15 वर्षों में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला डबल्स जोड़ी बनकर इतिहास रचा। हालांकि, उनका सफर सेमीफाइनल में दुनिया की नंबर-1 चीनी जोड़ी लियू शेंग शू और टैन निंग के खिलाफ हार के साथ खत्म हुआ।

दुनिया की टॉप जोड़ियों को हरा चुके हैं

गायत्री ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की शीर्ष जोड़ियों के खिलाफ जीत और अच्छे प्रदर्शन ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया है। उनके मुताबिक, ट्रीसा-गायत्री अब दुनिया की बेहतरीन जोड़ियों को चुनौती देने में सक्षम हैं।

उन्होंने कहा कि फिलीपींस चैलेंज के बाद टीम को अच्छा मोमेंटम मिला और विश्व चैंपियनशिप तक पहुंचते-पहुंचते दोनों खिलाड़ियों का खुद पर भरोसा काफी बढ़ चुका था।

गायत्री ने बताया कि टूर्नामेंट शुरू होने से पहले उन्हें ब्रॉन्ज मेडल की खास उम्मीद नहीं थी। उनका लक्ष्य सिर्फ कोर्ट पर अपना 100 प्रतिशत देना, खेल का आनंद लेना और बेहतर प्रदर्शन करना था।

सेमीफाइनल की हार ने सिखाया धैर्य का सबक

चीन की नंबर-1 जोड़ी के खिलाफ ट्रीसा और गायत्री ने पहला गेम अपने नाम किया, लेकिन इसके बाद लगातार तीन गेम गंवाकर मुकाबला हार गईं।

गायत्री के मुताबिक, इस मुकाबले ने उन्हें बताया कि दुनिया की शीर्ष जोड़ियों के खिलाफ लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए धैर्य बेहद जरूरी है। उन्होंने माना कि पहले गेम के बाद दोनों ने थोड़ा सब्र खो दिया और जल्दी-जल्दी अंक हासिल करने की कोशिश की।

उनका कहना है कि दुनिया की नंबर-1 और नंबर-2 जोड़ियां आसानी से अंक नहीं देतीं और उनके खिलाफ हर पॉइंट के लिए धैर्य के साथ खेलना पड़ता है।

ट्रीसा के साथ साझेदारी ने बनाया मजबूत

गायत्री ने अपनी सफलता में ट्रीसा जॉली के साथ साझेदारी को भी अहम बताया। उन्होंने कहा कि दोनों के खेलने के अंदाज अलग हैं और यही अंतर कोर्ट पर एक-दूसरे की कमियों को पूरा करता है।

गायत्री के अनुसार, ट्रीसा आक्रामक खेलती हैं और कोर्ट पर उनकी मौजूदगी साफ नजर आती है। दोनों के अलग-अलग स्वभाव और खेल शैली ने उनकी जोड़ी को मजबूत बनाया है।

सिंगल्स से डबल्स तक का सफर

गायत्री के लिए यह पदक इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने अपने करियर में सिंगल्स से डबल्स का रुख किया था। उन्होंने कहा कि अगर 15 साल की उम्र वाली गायत्री आज का यह सफर देखतीं तो शायद उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि वह सिंगल्स छोड़कर डबल्स में आ चुकी हैं और विश्व चैंपियनशिप का पदक जीत रही हैं।

उनके मुताबिक, वह खुद पर गर्व और खुशी महसूस करतीं।

चोटों के बाद वापसी ने बढ़ाया आत्मविश्वास

पिछला दौर चोटों से भरा रहा, लेकिन वापसी के बाद विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने से गायत्री का आत्मविश्वास और बढ़ा है।

उन्होंने कहा कि यह मेडल उनके लक्ष्य को पूरी तरह नहीं बदलता, लेकिन इससे उन्हें विश्वास मिला है कि अब चीजें अलग हो सकती हैं और भविष्य में बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

पिता पुलेला गोपीचंद भी रहे साथ

गायत्री के पिता और भारत के दिग्गज बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद भी कोर्ट के बाहर से उन्हें मार्गदर्शन देते रहे। हालांकि, गायत्री के मुताबिक मैच के दौरान पिता होने के कारण उन्हें कोई विशेष रियायत नहीं मिलती।

उन्होंने बताया कि मैच के दौरान गोपीचंद सभी खिलाड़ियों की तरह ही सख्ती से बात करते हैं। विश्व चैंपियनशिप के दौरान उनका सबसे अहम संदेश था—शांत रहो और खेल का मजा लो।

अब नजर विश्व खिताब पर

ब्रॉन्ज मेडल ने ट्रीसा जॉली और गायत्री गोपीचंद को यह भरोसा दे दिया है कि वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ जोड़ियों के बीच जगह बना सकती हैं। सेमीफाइनल की हार से मिले सबक और बढ़े आत्मविश्वास के साथ भारतीय जोड़ी की अगली बड़ी चुनौती अब विश्व चैंपियन बनने की दिशा में कदम बढ़ाना होगी।

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