सिर्फ 7 मिनट में 22 किमी तक पहुंचा तबाही का सैलाब, 167 किमी/घंटा की रफ्तार से नेपाल में मचा हाहाकार

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट में खुलासा, 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टान और मलबा ल्हेंदे नदी में गिरा; 903 लोगों की मौत, 13 हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित

काठमांडू: नेपाल में 26 अगस्त को भोटेकोशी-त्रिशूली गलियारे में मची भीषण तबाही को लेकर नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट में कई बड़े और अहम खुलासा हुए हैं। नेपाल एनवॉयरमेंट सोसाइटी (NES) की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विनाशकारी बाढ़ सामान्य भारी बारिश या फिर बादल फटने की वजह से नहीं हुआ है, बल्कि ऊंचे हिमालय में बर्फ, चट्टानों और मलबे के बड़े हिस्से के हिमस्खलन की वजह से हुआ था। 

स्टडी के मुताबिक, रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का बड़ा हिस्सा नीचे गिरकर ल्हेंदे नदी में जा पहुंचा। इसके बाद पानी और मलबे का तेज प्रवाह भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी में पहुंचा, जिसने उत्तरी और मध्य नेपाल के कई शहरों और गांवों को अपनी चपेट में ले लिया और भारी तबाही मचा दी।

अधिकारियों के अनुसार, अचानक आई इस बाढ़ में मृतकों की संख्या बढ़कर 903 हो गई है और शवों की बरामदगी अभी भी की जा रही है। 

आपके लिए ये जानना जरूरी?

इस रिपोर्ट का महत्व सिर्फ यह जानने तक सीमित नहीं है कि नेपाल में बाढ़ कैसे आई। बल्कि आपको ये बताना भी है की पहाड़ी इलाकों में बाढ़ हमेशा बारिश की ही वजह से नहीं आती है।

ग्लेशियर, बर्फीली चट्टानों, भूस्खलन और नदियों के अचानक अवरुद्ध होने जैसी घटनाएं भी बेहद कम समय में विनाशकारी बाढ़ पैदा कर सकती हैं। ऐसे में सिर्फ बारिश के आंकड़ों के आधार पर बाढ़ का खतरा समझना पूरी तरह से पर्याप्त नहीं हो सकता।

नेपाल जैसी हिमालयी आपदाओं का असर भारत के पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है। इसलिए इस तरह के अध्ययन अर्ली वार्निंग सिस्टम, नदी निगरानी, आपदा प्रबंधन और बाढ़ की भविष्यवाणी के लिए जरूरी हो सकते हैं।

5,200 मीटर की ऊंचाई से शुरू हुआ था मलबे का सैलाब

अध्ययन के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नीचे गिरना शुरू हुए।

करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से खड़ी ढलान पर तेजी से नीचे आया यह मलबा लगभग 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में पहुंचा। इसके बाद नदी का प्रवाह भोटेकोशी और फिर त्रिशूली की ओर बढ़ा गया। ये बाढ़ जहां-जहां पहुंची हर तरफ तबाही का मंजर ही देखने को मिला। 

सेटेलाइट इमेज के विश्लेषण में करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े भौगोलिक बदलाव दिखाई दिए हैं। वहीं लगभग 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर अलग होने के संकेत मिले हैं।

सिर्फ सात मिनट में 22 किलोमीटर का सफर

रिपोर्ट में सामने आया कि बर्फ, चट्टान और मलबे का यह विशाल प्रवाह सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी पहुंच गया।

इसकी अनुमानित औसत गति 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटा थी।

रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी रफ्तार घटकर लगभग 73 किलोमीटर प्रति घंटा और आगे नीचे की ओर करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई। हालांकि गति कम होने के बावजूद प्रवाह अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, तलछट और मिट्टी बहाता रहा।

बाढ़ से पहले नदी का जलस्तर क्यों घटा?

स्टडी में एक और जरूरी क्लू सामने आया। बाढ़ आने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी क्षेत्रों में नदी का जलस्तर और बहाव कम हुआ था।

रसुवागढ़ी में सुबह पांच से आठ बजे के बीच औसत जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई। वहीं स्याफ्रुबेसी में करीब सात बजे नदी का बहाव कम होना शुरू हो गया था।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस तरह के बदलाव आगे की जांच के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं और यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि क्या ऊपरी हिस्से में नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए बाधित हुआ था।

GLOF की आशंका को रिपोर्ट ने किया खारिज

अध्ययन में कहा गया है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह आपदा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी हिमनद झील के अचानक फटने से आई बाढ़ नहीं थी।

रिसर्चर्स ने सेटेलाइट इमेज के अलावा जल विज्ञान और मौसम संबंधी आंकड़ों, भू-भाग की विशेषताओं तथा नदी तंत्र में ऊंचाई और ढलान से जुड़े बदलावों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में GLOF के कोई साक्ष्य नहीं मिले।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया, पिघलती बर्फ की भूमिका और क्या नदी का बहाव कुछ समय के लिए बाधित हुआ था, यह निर्धारित करने के लिए मैदानी जांच अभी जरूरी है।

भारी बारिश के दावे पर भी उठे सवाल

अध्ययन में कहा गया कि उस दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण रूप से भारी बारिश होने के कोई साक्ष्य नहीं मिले।

इससे यह धारणा कमजोर होती है कि आपदा सिर्फ अत्यधिक बारिश या बादल फटने के कारण हुई थी। वैज्ञानिक अब बर्फ, चट्टान और मलबे के अचानक खिसकने को आपदा के प्रमुख कारणों में देख रहे हैं।

बिजली परियोजनाओं को भी भारी नुकसान

बाढ़ की तबाही का असर नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ा है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, 13 पनबिजली परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुई हैं।

इससे करीब 431 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता फिलहाल प्रणाली से बाहर हो गई है।

इसका असर सिर्फ बिजली कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित होने पर स्थानीय स्तर पर बिजली आपूर्ति, उद्योग, कारोबार और जरूरी सेवाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है।

तीन लाख करोड़ नेपाली रुपये के नुकसान का शुरुआती अनुमान

सरकार के प्रारंभिक आकलन के हवाले से रिसर्च में आर्थिक नुकसान करीब तीन लाख करोड़ नेपाली रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है।

हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में हुए नुकसान का विस्तृत आकलन अभी जारी है। इसलिए अंतिम आर्थिक नुकसान इससे अलग हो सकता है।

आगे क्या होगा?

वैज्ञानिकों के मुताबिक अब मैदानी स्तर पर विस्तृत जांच जरूरी है। इसमें यह पता लगाना अहम होगा कि बर्फ और चट्टानों के खिसकने की सटीक वजह क्या थी, पिघली हुई बर्फ ने प्रवाह में कितना योगदान दिया और क्या किसी स्थान पर नदी का रास्ता अस्थायी रूप से बाधित हुआ था।

इन सवालों के जवाब भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन की बेहतर निगरानी तथा समय रहते चेतावनी जारी करने की व्यवस्था तैयार करने में मदद कर सकते हैं।

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