Bareilly News : बरेली में रेलवे कॉलोनी के 200 से ज्यादा मकानों पर बुलडोजर चलाने की तैयारी, अंग्रेजों के दौर में बनाए गए थे घर

Amrit Vichar Network
Edited By Ateeq Khan
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अंग्रेजों के जमाने में बसाई गई थी ये रेलवे कॉलोनी

रेलवे कर्मचारियों का आरोप है कि जर्जर क्वार्टरों की स्थिति को लेकर कई बार अधिकारियों से शिकायत की जा चुकी है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। कर्मचारियों ने जर्जर भवनों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी वायरल किए, ताकि अधिकारियों का ध्यान इस ओर खींचा जा सके।

अमृत विचार : बरेली जंक्शन के आसपास अंग्रेजों के जमाने में बसाई गईं रेलवे कॉलोनीज के 200 से अधिक मकान अब रहने लायक नहीं बचे हैं। दक्षिण रेलवे कॉलोनी, उत्तर रेलवे कॉलोनी और लोको कॉलोनी में बड़ी संख्या में पुराने क्वार्टर जर्जर घोषित किए जा चुके हैं। इन भवनों पर अब रेलवे बुलडोजर चलने की तैयारी में है। आईओडब्ल्यू विभाग की ओर से ध्वस्तीकरण का स्टीमेट तैयार कराया जा रहा है। स्टीमेट बनते ही इन जर्जर भवनों को गिराने की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, जर्जर घोषित किए गए कई मकान खाली पड़े हैं, जबकि कुछ में अब भी रेलवे कर्मचारी और उनके परिवार रह रहे हैं। ऐसे आवासों में रह रहे लोगों को विभाग की ओर से नोटिस जारी कर उन्हें खाली करने के लिए कहा गया है। 

रेलवे का तर्क है कि दशकों पुराने इन भवनों की हालत ऐसी हो चुकी है कि कभी भी कोई हादसा हो सकता है। बरेली जंक्शन के पास स्थित लोको कॉलोनी में करीब 400 क्वार्टर बताए जाते हैं। इनमें लगभग 250 क्वार्टर अंग्रेजों के शासनकाल के आसपास बनाए गए थे, जबकि बाकी आवास वर्ष 2000 के आसपास बनाए गए थे। पुराने क्वार्टरों में से कई अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। 

दीवारों में दरारें, छतों से टपकता पानी और कमजोर ढांचा इन आवासों की बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। बारिश के मौसम में इन मकानों की हालत और खराब हो जाती है। बाहर बारिश होने के साथ ही कई आवासों के भीतर भी पानी टपकने लगता है। कर्मचारियों का कहना है कि छतों से पानी टपकने के कारण घर का सामान तक खराब हो जाता है। परिवारों को हर बारिश में मकान की छत और दीवारों को लेकर डर बना रहता है।

शिकायतों के बाद भी नहीं बदली तस्वीर

रेलवे कर्मचारियों का आरोप है कि जर्जर क्वार्टरों की स्थिति को लेकर कई बार अधिकारियों से शिकायत की जा चुकी है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। कर्मचारियों ने जर्जर भवनों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी वायरल किए, ताकि अधिकारियों का ध्यान इस ओर खींचा जा सके। उनका कहना है कि समय-समय पर मरम्मत के नाम पर बजट खर्च होने के बावजूद पुराने भवनों की हालत में अपेक्षित सुधार नहीं आया।

कर्मचारियों का सवाल है कि जब भवन रहने योग्य ही नहीं रह गए हैं तो उनमें मरम्मत कराने के बजाय सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही। वहीं, अब रेलवे की ओर से इन भवनों को जर्जर घोषित कर ध्वस्तीकरण की तैयारी किए जाने से लंबे समय से चली आ रही समस्या के खत्म होने की उम्मीद जगी है।

बारिश में घर नहीं, खतरे का ठिकाना

लोको कॉलोनी के जर्जर क्वार्टरों में रहने वाले कर्मचारियों के लिए बारिश सबसे बड़ी मुसीबत बन जाती है। छतों से पानी टपकने और दीवारों में सीलन के कारण घर के भीतर रखा सामान तक खराब हो जाता है। कर्मचारियों का कहना है कि हर बारिश में उन्हें इस बात का डर सताता है कि कहीं कमजोर छत या दीवार भरभराकर न गिर जाए।

लोको कॉलोनी के करीब 400 क्वार्टरों में लगभग 250 पुराने क्वार्टर अंग्रेजों के जमाने के बताए जाते हैं। इनमें कई क्वार्टर अब जर्जर घोषित किए जा चुके हैं। दक्षिण और उत्तर रेलवे कॉलोनी के पुराने आवासों को मिलाकर जर्जर भवनों की संख्या 200 से अधिक बताई जा रही है। रेलवे अब इन भवनों को खाली कराकर चरणबद्ध तरीके से ध्वस्त करने की तैयारी में है।

क्या बोले अधिकारी


आईओडब्ल्यू चमन सिंह ने बताया कि कुछ जर्जर मकानों में अभी लोग रह रहे हैं। उन्हें नोटिस जारी किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि जर्जर भवनों को गिराने के लिए स्टीमेट तैयार कराया जा रहा है। स्टीमेट तैयार होने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। रेलवे कॉलोनियों में दशकों पुराने इन भवनों के ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होने से जहां हादसे का खतरा कम होगा, वहीं कर्मचारियों के लिए सुरक्षित आवास की जरूरत भी सामने आएगी।

 

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