फीस के मानक
खबर है कि केंद्र सरकार निजी स्कूलों में फीस के मानक निर्धारित करने जा रही है। समान शिक्षा और समान फीस को आधार मानकर देश भर में एक फीस निर्धारित करने की योजना है। अगर ऐसा किया जाए तो निश्चित ही सरकार का यह सराहनीय कदम होगा, क्योंकि फीस के नाम पर अभिभावकों का शोषण …
खबर है कि केंद्र सरकार निजी स्कूलों में फीस के मानक निर्धारित करने जा रही है। समान शिक्षा और समान फीस को आधार मानकर देश भर में एक फीस निर्धारित करने की योजना है। अगर ऐसा किया जाए तो निश्चित ही सरकार का यह सराहनीय कदम होगा, क्योंकि फीस के नाम पर अभिभावकों का शोषण किसी से छुपा नहीं है। निजी स्कूलों में फीस के मनमाने मानक हैं। स्कूल प्रबंधन की ओर से अपने-अपने हिसाब से फीस वसूली जाती है। नतीजा यह कि स्कूल संचालक मालामाल होते जाते हैं और इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावक फीस के बोझ से दबे रहते हैं।
मध्यवर्गीय लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा महज बच्चों की फीस पर ही खर्च हो जाता है। अलबत्ता, एक पहलू यह भी है कि सीबीएसई और आईसीएसई की मान्यता पर चलने वाले कथित नामी-गिरामी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने की अभिभावकों में होड़ स्टेटस सिंबल के रूप में देखने को मिलती है। कथित अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को अभिभावक इसलिए पढ़ाना चाहते हैं ताकि समाज में वह कह सकें कि उनका बच्चा फलां स्कूल में पढ़ता है। इसका लाभ उठाते हुए ही स्कूल संचालक अभिभावकों की जेब ढीली करते हैं।
दूसरा पहलू सरकार और सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों की दशा का है। भले ही सरकार अपने स्कूलों पर मोटा बजट खर्च करती है लेकिन निजी स्कूलों जैसी साख और विश्वसनीयता नहीं बना पा रही है। जबकि सरकारी स्कूलों में संसाधन कम नहीं हैं। प्रशिक्षित अध्यापक भी हैं फिर भी अभिभावक इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने से परहेज करते हैं।
सरकार को अपने स्कूलों के प्रति अभिभावकों में आकर्षण पैदा करने के उपाय करने होंगे। यह तभी संभव है, जब जनप्रतिनिधि, अधिकारी और समाज के प्रतिष्ठित लोग इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश कराएं। बहरहाल, जहां तक फीस की बात है तो सरकार को अवश्य इसके मानक तय करने चाहिए लेकिन यह ध्यान जरूर रखना चाहिए कि यह फीस इतनी नहीं होनी चाहिए कि आम अभिभावक उसे वहन ही न कर पाए।
वैसे, उत्तर प्रदेश में कुछ साल पहले ही फीस निर्धारण अध्यादेश लाया गया था लेकिन उसका पालन नहीं किया जा सका। सरकारी तंत्र स्कूल प्रबंधन के दबाव में घिर गया और आज भी मनमाने ढंग से फीस की वसूली हर स्कूल कर रहा है। भला ऐसे अध्यादेश का क्या फायदा? बेहतर हो सरकार फीस निर्धारण की दिशा में जो भी कदम उठाए वह अभिभावकों के न सिर्फ हित में हो बल्कि सरकारी मशीनरी उसका पालन भी कराए पाए, तभी उसकी सार्थकता होगी।
