अच्छा निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि मृतक आश्रित कोटे में विवाहित पुत्री को भी नियुक्ति का अधिकार है। हाईकोर्ट ने कहा है कि बेटे की तरह बेटी भी परिवार की सदस्य होती है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित सेवा नियमावली में अविवाहित शब्द को लड़का-लड़की के …
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि मृतक आश्रित कोटे में विवाहित पुत्री को भी नियुक्ति का अधिकार है। हाईकोर्ट ने कहा है कि बेटे की तरह बेटी भी परिवार की सदस्य होती है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित सेवा नियमावली में अविवाहित शब्द को लड़का-लड़की के आधार पर भेद करने वाला मानते हुए असंवैधानिक करार दिया है।
हाईकोर्ट का यह फैसला लड़का और लड़की में भेदभाव और समान अधिकारों से वंचित किए जाने के खिलाफ महत्वपूर्ण है। आज जब हम लड़के और लड़कियों में समानता की प्रबल पैरवी कर रहे हैं, लड़कियां भी किसी मामले में लड़कों से कमतर नहीं हैं। वह खुद को समाज के बीच साबित करके दिखा रही हैं तो उनको अधिकार देने के मामले में हीलाहवाली समान अधिकार की भावना के विपरीत है।
कोर्ट पहले भी लड़कियों को भाइयों की तरह पिता की संपत्ति पर समान अधिकार का आदेश पारित कर चुका है। ऐसे में, मृतक आश्रित कोटे में विवाहित पुत्र को नियुक्ति देने से इन्कार करने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट रद करके इस मामले में नजीर पेश कर दी है। हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद अब विवाहित पुत्रियों को भी मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने का अधिकार हासिल होने का रास्ता साफ हो गया है।
यह निर्णय उन लड़कियों के हक में होगा जो अपने भाइयों के आर्थिक मजबूती के बावजूद पति के आर्थिक रूप से कमजोर होने की स्थिति में नौकरी हासिल करके खुद के कदम पर खड़ी होना चाहती हैं। विधवा महिलाएं भी अपने सरकारी नौकरीपेशा माता-पिता की मृत्यु की दशा में मृतक आश्रित की नौकरी अब हासिल कर पाएंगी। मध्यवर्गीय परिवारों में विधवा को बच्चों के पालन-पोषण के लिए विपरीत आर्थिक परिस्थितियों से दोचार होना पड़ता है, ऐसे में यह निर्णय उन महिलाओं के लिए हितकर है।
अब चूंकि समाज में बहुत कुछ बदल रहा है। लड़कियों को कमतर आंकने और उनको सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक अधिकारों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। अच्छी बात यह है कि समय-समय पर अदालतों से ऐसे फैसले किए जा रहे हैं, जो लिंगभेद को मिटाकर लड़कियों को भी समान अधिकारों को प्रदान करते हैं। समाज को भी अब सोच बदलनी चाहिए। हम जितना हक लड़कों को देना चाहते हैं, उतना ही लड़कियों को देने के पक्षधर बनें। लड़कियां किसी मायने में लड़कों से कम नहीं। यह बात हम सबको समझनी होगी।
