विकास की विसंगति

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Edited By Amrit Vichar
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गत सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व आर्थिक मंच के दावोस समिट में अपने ऑनलाइन संबोधन में कहा था कि वे वैश्विक बिजनेस कम्युनिटी को आश्वस्त करना चाहते हैं कि अब आर्थिक मोर्चों पर भी हालात में तेजी से बदलाव आएगा। उन्होंने दुनियाभर के निवेशकों को भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनने के लिए …

गत सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व आर्थिक मंच के दावोस समिट में अपने ऑनलाइन संबोधन में कहा था कि वे वैश्विक बिजनेस कम्युनिटी को आश्वस्त करना चाहते हैं कि अब आर्थिक मोर्चों पर भी हालात में तेजी से बदलाव आएगा। उन्होंने दुनियाभर के निवेशकों को भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित भी किया।

पिछले दिनों आरबीआई प्रमुख ने भी कहा था कि अर्थव्यवस्था महामारी के दौर से निकल रही है और जीडीपी पटरी पर लौटने को है। निस्संदेह यह आकलन देश की उम्मीद बढ़ाने वाला है। यह अच्छी बात कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था उम्मीद से बेहतर परिणाम देगी, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि उत्साहवर्धक विकास की किरण हर आम आदमी तक भी पहुंचे। यानी विकास समाज में तेजी से बढ़ रही असमानता की खाई को भी दूर करे।

भारत में लोगों की संपत्ति को लेकर आई दुनिया भर में वंचित समुदायों की स्थिति पर काम करने वाली वैश्विक संस्था ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट चौंकाने वाली है। ऑक्सफेम प्रतिवर्ष एक अध्ययन रिपोर्ट जारी करती है। इस बार ऑक्सफेम की यह रिपोर्ट ‘असमानता के वायरस’ के नाम से हाल ही में प्रकाशित हुई है, जो भारत के संदर्भ में कई चुनौतियों की ओर इशारा करती है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सिर्फ एक फीसदी आबादी के पास बाकी 70 फीसदी जनसंख्या की कुल संपत्ति का चार गुना धन है। अगर इस रिपोर्ट पर भरोसा करें तो देश के 63 अमीरों के पास बजट से भी ज्यादा पैसा है। इस रिपोर्ट ने बताया है कि कोरोना संकट के दौरान जहां देश के उद्योग धंधे और विभिन्न क्षेत्र रोजगार के संकट से जूझ रहे थे, तमाम लोगों के रोजगार छिने व वेतन में कटौती की गई, उसी दौरान देश के शीर्ष धनाढ्य वर्ग की आय में 35 फीसदी की वृद्धि हुई, जो हमारे विकास की विसंगति को दर्शाता है कि जहां देश का बड़ा तबका लॉकडाउन के दंश झेल रहा था तो एक वर्ग संकट में मालामाल हो रहा था।

देश में पिछले तीन दशक से आर्थिक असमानता निरंतर बढ़ती जा रही है। कोरोना काल में इसकी गति और तेज हो गई। बेशक इसके लिए वे नीतियां जिम्मेदार हैं, जो आम आदमी के मुकाबले कॉरपोरेट घरानों के फायदे के लिए काम करती हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि ये सब यूं ही कब तक चलता रहेगा? सत्ता में बैठे लोग संविधान की भावना के अनुरूप आय की असमानता को कम करने के लिए कब कुछ काम करेंगे?