बातचीत ही हल

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Edited By Amrit Vichar
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किसान आंदोलन देश में इस समय सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। अब अंतर्राष्ट्रीय मंचों से भी किसान आंदोलन के लिए आवाजें उठने लगी हैं। किसान आंदोलन में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई घटनाओं से थोड़ा व्यवधान पड़ा था, लेकिन अब आंदोलन फिर अपनी गति में आ गया है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर …

किसान आंदोलन देश में इस समय सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। अब अंतर्राष्ट्रीय मंचों से भी किसान आंदोलन के लिए आवाजें उठने लगी हैं। किसान आंदोलन में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई घटनाओं से थोड़ा व्यवधान पड़ा था, लेकिन अब आंदोलन फिर अपनी गति में आ गया है।

अंतराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हस्तियां भी किसानों को अपना समर्थन दे रही हैं। पॉप स्टार रिहाना ने किसानों के प्रदर्शन के समर्थन में किए ट्वीट में लिखा कि हम किसानों की बात क्यों नहीं कर रहे। उनके इस ट्वीट पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई। कृषि कानून के विरोध में केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच पिछले दो माह में मतभेद काफी गहरा गए हैं।

किसान संगठनों व सरकार के बीच अभी तक हुई कई दौर की वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। किसान तीनों कृषि कानूनों की वापसी तक आंदोलन छोड़ने को राजी नहीं हैं। स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए फिर ट्वीट किया कि मैं अब भी किसानों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को समर्थन दे रही हूं। किसी भी तरह की नफरत, धमकियां और मनावाधिकारों के हनन से इसमें कोई बदलाव नहीं होने वाला।

इस पर कई मंत्रियों ने कहा है कि यह बहुत गंभीर है। साफ होता है कि कुछ विदेशी ताकतें भारत को बदनाम करने की साजिश कर रही हैं। रिहाना, ग्रेटा थनबर्ग जैसे अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के समर्थन से जुड़े मामले पर किसान नेता राकेत टिकैत कह रहे हैं कि मुझे क्या पता ये विदेशी कलाकार कौन हैं। कर रहे होंगे आंदोलन को समर्थन।

आज कुछ लोग किसानों के पक्ष में खुलकर खड़े हैं, वहीं कुछ आंदोलनकारी किसानों के आंदोलन को दुष्प्रचार बताते हुए इसका उद्देश्य देश में अस्थिरता पैदा करना मान रहे हैं। विदेश मंत्रालय का कहना है कि विवादास्पद मुद्दे में कूदने से पहले सभी को उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करनी चाहिए।

हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह देश का आंतरिक मामला है। आंदोलनकारी किसान और सरकार इसका समाधान ढूंढने में सक्षम है। बाहर से किसी को भी इसमें दखल नहीं देना चाहिए। जबकि पिछले दिनों हुई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को दिया गया कृषि कानूनों संबंधी केंद्र का प्रस्ताव अब भी कायम है और इसका हल बातचीत से ही निकलेगा। यह सच है कि संवाद ही ऐसा माध्यम होता है, जिससे किसी भी विवाद के रास्ते निकल सकते हैं और इससे किसी को परहेज नहीं होना चाहिए।