सबक लेने का समय
जून 2013 में आई आपदा के बाद उत्तराखंड में एक बार फिर भारी तबाही देखने को मिली है, जिससे वैज्ञानिक भी हैरान हैं। रविवार को चमोली के जोशीमठ में ग्लेशियर टूटने से धौलीगंगा नदी में बाढ़ आ गई है। इससे भारी तबाही की आशंका जताई जा रही है। बाढ़ आने से ऋ षि गंगा और …
जून 2013 में आई आपदा के बाद उत्तराखंड में एक बार फिर भारी तबाही देखने को मिली है, जिससे वैज्ञानिक भी हैरान हैं। रविवार को चमोली के जोशीमठ में ग्लेशियर टूटने से धौलीगंगा नदी में बाढ़ आ गई है। इससे भारी तबाही की आशंका जताई जा रही है। बाढ़ आने से ऋ षि गंगा और तपोवन हाइड्रो प्रोजेक्ट पूरी तरह से ध्वस्त हो गए हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ठंड में इस तरह की घटना होना आश्चर्यजनक है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन ज्योलॉजी के वैज्ञानिक डा. अमित कुमार का कहना है कि अमूमन सर्दी के दिनों में ग्लेशियर नहीं टूटा करते। हो सकता है कि जमीन के नीचे कटाव होने के चलते ऐसा हुआ हो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से बात कर हालात की समीक्षा की। मुख्यमंत्री रावत का कहना था कि राहत की बात है कि नंदप्रयाग से आगे अलकनंदा नदी का बहाव सामान्य हो गया है। आपदा को लेकर उत्तर प्रदेश में भी गंगा नदी के किनारे वाले जनपदों में अलर्ट जारी किया गया है।
उत्तराखंड में बचाव कार्य जारी हैं। आईटीबीपी के जवान बचाव कार्य के लिए पहुंचे हैं। सेना ने उत्तराखंड सरकार और एनडीआरएफ की मदद के लिए चॉपर और सैनिकों को तैनात किया है। सेना मुख्यालय से भी हालात पर नजर रखी जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस समय हर संभव मदद देने आश्वासन दिया है।
आपदाओं के समय एकजुटता बनाए रखकर, उससे जूझने की तैयारियों से ही किसी भी समाज के विकास और संवेदना का पता चलता है। हालांकि पिछले 20 वर्षों में केंद्र व राज्य सरकारों ने आपदा प्रबंधन पर बेहतरी से काम किया है और एक बार फिर हमारे इन्हीं प्रबंधनों की परीक्षा है।
आपदा से निबटने के लिए उत्तराखंड व केंद्र सरकार को बड़े पैमाने पर प्रभावी कदम उठाने के साथ ही इसमें जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। याद रखना होगा कि जब जलवायु परिवर्तन के कारण देश आपदाओं की आशंकाओं से चौतरफा जूझ रहा है, तब हमें आपदा प्रबंधन की तमाम क्षमताओं और संसाधनों को संयोजित करके रखना चाहिए।
यह जहां एक ओर, सबके लिए सीखने का समय है, वहीं हमें प्राकृतिक आपदाओं की मूल वजहों को भी ध्यान में रखना चाहिए। लोग प्रकृति के प्रति हमारा प्रेम भी बढ़ाएं, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आकार-प्रकार में कमी आए। हर किसी को इसमें भागीदारी निभानी होगी, एक-दूसरे पर इसका दायित्व छोड़ने की भावना से भला नहीं हो सकता है। पूरी ईमानदारी से सामूिहक प्रयास किए जाने की अावश्यकता है।
