चीन से समझौता
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में कहा कि चीन के साथ पैगोंग झील के उत्तर तथा दक्षिणी किनारों पर सैनिकों को पीछे हटाने से संबंधित समझौता हो गया है। समझौते के अनुसार दोनों पक्ष अग्रिम मोर्चों पर तैनात सैनिकों को चरणबद्ध, समन्वित और प्रमाणित ढंग से हटाएंगे। इस बातचीत में देश ने …
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में कहा कि चीन के साथ पैगोंग झील के उत्तर तथा दक्षिणी किनारों पर सैनिकों को पीछे हटाने से संबंधित समझौता हो गया है। समझौते के अनुसार दोनों पक्ष अग्रिम मोर्चों पर तैनात सैनिकों को चरणबद्ध, समन्वित और प्रमाणित ढंग से हटाएंगे। इस बातचीत में देश ने कुछ भी नहीं खोया है और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कुछ क्षेत्रों में तैनाती तथा गश्त से संबंधित कुछ मुद्दे अभी लंबित हैं। हमने जिन तीन सिद्धांतों पर जोर दिया है, उनमें वास्तविक नियंत्रण रेखा को माना जाए और उसका आदर किया जाए, किसी स्थिति को बदलने का एकतरफा प्रयास न किया जाए व सभी समझौतों का पालन किया जाए आदि शामिल है।
राहत की बात है कि रक्षा मंत्री ने चीन को सुलह के नियम बताए और उन्होंने चीन को भारत की ताकत से भी अवगत कराया। याद रखना होगा कि दोनों देशों के संबंधों को लेकर चीन का इतिहास चालाकियों से भरा रहा है। दोनों देशों के रिश्ते चीन के विश्वासघाती रवैये की वजह से ही बिगड़े हैं।
कुछ दिन पहले ही विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने कहा था कि लद्दाख से सैनिकों को हटाने को लेकर भारत व चीन के बीच सहमति बनी थी। पर कोई असर नहीं दिखा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीनी सेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल 2020 से पहले वाली स्थिति को बदल दिया है। उसकी फौजें जिस दिन पुरानी जगहों पर चली जाएंगी, हालात उसी दिन सामान्य हो जाएंगे।
ध्यान देना होगा कि उसके अड़ियलपन के कारण ही तमाम कोशिशों के बावजूद सीमा पर तनाव कम करना संभव नहीं हो पा रहा। फौज वापसी की राह भारत और चीन को आपस में ही मिलकर निकालनी होगी। इसके लिए फिलहाल पहला लक्ष्य यही हो सकता है कि जब तक यथास्थिति की वापसी नहीं होती, तब तक दोनों तरफ सैनिकों की तैनाती में कमी लाई जाए।
रक्षा मंत्री ने बताया भी है कि दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच शुक्रवार को अगले दौर की बातचीत फिर से होगी। जरूरी है कि अब चीन के साथ बातचीत का क्रम जारी रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य की बदलती वास्तविकताओं के बीच यदि भारत एक अंतर्राष्ट्रीय शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहता है तो उसे अपनी विदेश नीति के साथ सावधानी पूर्वक आगे बढ़ना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे मंच के माध्यम से भी भारत को तिब्बत से लेकर ताइवान तक चीन की आक्रामकता के मुद्दे को उठाना चाहिए।
