हल्द्वानी: सजन रेडियो बजई दे जरा…सामुदाायिक रेडियो की अलग है बात

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Edited By Amrit Vichar
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हल्द्वानी, अमृत विचार। रेडियो एक ऐसा साथ है, जिसके साथ किसी न किसी की कोई न कोई याद जरूर जुड़ी हुई है। सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण स्रोत रेडियो आज भी हजारों दिलों की धड़कन है। सैकड़ो मनोरंजन के साधनों के बीच रेडियो आज भी अपनी विश्वसनियता के साथ कई दिलों पर राज कर रहा है। …

हल्द्वानी, अमृत विचार। रेडियो एक ऐसा साथ है, जिसके साथ किसी न किसी की कोई न कोई याद जरूर जुड़ी हुई है। सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण स्रोत रेडियो आज भी हजारों दिलों की धड़कन है। सैकड़ो मनोरंजन के साधनों के बीच रेडियो आज भी अपनी विश्वसनियता के साथ कई दिलों पर राज कर रहा है।

रेडियो ने मनोरंजन के साथ-साथ आपदा राहत और आपातकालीन प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोरोना काल में भी रेडियो की भूमिका सराहनीय रही है। रेडियो की लोकप्रियता, विश्वसनियता और पहुंच को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात कहने के लिए रेडियो को ही चुना। बात जब कुमाऊं क्षेत्र की आती है तो यहां सामुदायिक रेडियो की अलग विशेषता है। इनके माध्यम से कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामुदायिक विकास, संस्कृति, लोकगीत कार्यक्रमों को प्रसारित किए जाते हैं। सामुदायिक रेडियो हर ग्रामीण को अपनी बात कहने की पूरी आजादी देता है।

कुमाऊं के पहले सामुदायिक रेडियो की आपुण बात…

कुमाऊं का पहला सामुदायिक रेडियो मुक्तेश्वर में 11 मार्च 2010 में शुरू किया गया था। टेरी संस्था द्वारा स्थापित सामुदायिक रेडियो कुमाऊं वाणी का उदघाटन तत्कालीन राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने किया था। इस रेडियो स्टेशन ने कुमाऊंनी भाषा को एक नयी दिशा दी है। कुमाऊं रेडियोवाणी के प्रबंधक मोहन कार्की ने बताया कि कार्यक्रम कुमाऊंनी मे तैयार किए जाते हैं साथ ही रेडियो जॉकी भी क्षेत्रीय बोली का ही प्रयोग करते हैं। वर्ष 2014 मे छोटे एवं हासिये किसानों के लिए चलने वाले कार्यक्रम “बाजार लाये बौछार” को सामुदायिक सहभागिता के लिए नेशनल अवार्ड से नवाजा गया था। साल 2013 मे जन सहभागिता को आधार बनाकर कुमाऊं की बेहतरी के विकास कार्यक्रमों मे मजबूती देने के लिए डेवलपमेंट एम्पावरमेंट फाउंडेशन की ओर से भी इसे मंथन अवार्ड दिया गया। कुमाऊं वाणी को 90.4 मेगाहर्ट्ज पर सुना जा सकता है। कुमाऊं वाणी  का अपना एक स्लोगन है आपुण रेडियो आपुण बात और इसी को चरितार्थ करते हुए रेडियो आज युवाओं,बुजुर्गों और महिलाओं का सुख-दुख का साथी बन गया है।

91.2 हैलो हल्द्वानी ने बदली शहर की धड़कन

साल 2012 में हल्द्वानी उत्तराखंड विश्वविद्यालय में 91.2 हैलो हल्द्वानी…बदलते शहर की धड़कन सामुदायिक रेडियो शुरू किया गया। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान हैलो हल्द्वानी ने कुमाऊंनी बोली में सरूली मधुली लॉकडाउन फसक, कुमाऊंनी कविताओं का कार्यक्रम घुर-घुघुती घुर, हमारे गीत हमारे थाती जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम प्रसारित किए। केंद्र यूओयू के सामुदायिक रेडियो प्रभारी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश चंद्र रयाल ने बताया कि डिजिटल युग में भले ही टेलीविजन और मोबाइल जैसी चीजें आने के बाद रेडियो का पहले जैसा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। मगर फिर भी इसका महत्व कम नहीं हुआ। वहीं रेडियो जॉकी सुनीता भास्कर और अनिल नैनवाल ने बताते हैं कि चुनौतियों तो बहुत हैं, सरकार से यह उम्मीद है कि रेडियो केवल सरकार की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहिए, इसे समाचार वाचन के साथ ही अन्य अधिकार भी दिए जाने चाहिए।

रेडियो का ‘अभिमन्यू… पंकज जीना

नैनीताल के ज्योलीकोट के पास चोपड़ा गांव में रहने वाले पंकज जीना जब मां के पेट में थे तो उनकी मां रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रम बहुत सुना करतीं थीं। शायद उसका ही असर रहा कि पंकज को बचपन से ही रेडियो पर सुनाई देने वाली आवाज आकर्षित करती थी। अक्सर स्कूल और कॉलेज के दिनों में पंकज जब वह मंच पर बोलते तो हर कोई उनकी आवाज का कायल हो जाता। पंकज ने नैनीताल के डीएसबी से ही पत्रकारिता की डिग्री ली। उसके बाद रेडियो जॉकी बनने का सपना जो उन्होंने देखा था, उसे पूरा कर दिखाया। उनकी आवाज के अंदाज का ही कमाल था कि बिना किसी वॉइस कोर्स के उन्हें बनारस में एक प्रतिष्ठित रेडियो एफएम ने बतौर जॉकी काम पर रख लिया। आज हजारों युवा उनके फैन हैं। उनका कहना है कि आने वाला समय रेडियो का है, क्योंकि समय के साथ रेडियो ने भी नए-नए प्रयोग कर डिजिटल में भी अपनी पहचान बना चुका है।

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