फांसी की सजा
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले की शबनम और उसका प्रेमी सलीम फांसी के फंदे पर लटकाए जाएंगे। दोनों ने 14 अप्रैल 2008 को एक बच्चे समेत 7 लोगों को कुल्हाड़ी से गला काटकर हत्या कर दी थी। देश को आजादी मिलने के बाद पहली बार किसी महिला अपराधी को मृत्युदंड की सजा दी जाएगी। यहां …
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले की शबनम और उसका प्रेमी सलीम फांसी के फंदे पर लटकाए जाएंगे। दोनों ने 14 अप्रैल 2008 को एक बच्चे समेत 7 लोगों को कुल्हाड़ी से गला काटकर हत्या कर दी थी। देश को आजादी मिलने के बाद पहली बार किसी महिला अपराधी को मृत्युदंड की सजा दी जाएगी। यहां पहली महिला को मृत्युदंड पर चर्चा की बजाय इस दंड के औचित्य और अपराध के मूल कारण पर गंभीरता से सोचना होगा।
मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई। एमनेस्टी इंटरनेशनल के एक अध्ययन के अनुसार, 101 देशों ने मृत्युदंड की व्यवस्था पर प्रतिबंध है। 33 देश ऐसे भी हैं जहां पिछले दस वर्षों से एक भी मृत्युदंड नहीं दिया गया है। 40 से अधिक ऐसे देश हैं जहां आज भी मृत्युदंड दिया जाता है।
इनमें मुख्य हैं- चीन, पाकिस्तान, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया और अरब देश। इसका सीधा अर्थ है इस दंड विधान में मृत्युदंड को के बारे में विश्वव्यापी चर्चा की नितांत आवश्यकता है। यह अब इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि अपराध और दंड दोनों ही बढ़ रहे हैं। साथ ही दुष्कर्म के साथ हत्या जैसे जघन्य अपराधों पर लगातार मृत्युदंद की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन भी देखे जाने लगे हैं।
सोशल मीडिया पर लगातार किसी न किसी घटना को लेकर ऐसी मांगे जोर पकड़ती रहती है। दूसरी ओर, मौत की सजा के विरोध में रहने वाले इसे न्यायिक हत्या करार देते हैं। दुनियाभर की मानवाधिकार संगठन के इसके विरोध में प्रखर रूप से स्वर मुखर करते रहते हैं।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी मृत्युदंड के विधान को नापसंद करते थे, उनका कहना था कि घृणा अपराध से होनी चाहिये, अपराधी से नहीं। वैसे भी किसी सजा मतलब यही तो होता है न कि लोग अपराध के अंजाम से सीख लेंगे। मगर, ऐसा होते नहीं देखा गया। अपराधों की गति और जघन्यता में भी किसी प्रकार की कमी नहीं देखी गई। अतएव यह मृत्युदंड तो कड़े कटघरे में है।
इसके साथ ही मृत्युदंड को कम-से-कम अमानवीय एवं हिंसक बनाने की भी पहल करनी होगी। मृत्युदंड की रिपोर्ट को सार्वजनिक करना, दंड को अधिक-से-अधिक पीड़ा रहित रखना एवं अपराधी को मनोवैज्ञानिक, मृत्युदंड को बरकरार रखते हुए भी दंड प्रणाली के मानवीय पक्ष को दृढ़ करने में सहायक होगा।
आजकल इस पर भी सहमति बनने लगी है कि अगर मृत्युदंड देना ही हो तो कम से कम पीड़ा के साथ दिया जाना चाहिये। भारत सरकार को भी इस संबंध में विचार करना चाहिये। यह भी आवश्यक है कि मृत्युदंड से जुड़ी बहस अपराधी के साथ ही खत्म नहीं हो जानी चाहिये, अपितु अपराध को लेकर समाज की नैतिक ज़िम्मेदारी पर भी बहस होनी चाहिये और मूल कारणों को तलाश कर उन पर अभियान की तर्ज पर कार्य होना चाहिए।
